Saturday, 16 February 2013


वैलेंटाइन पर विलेन बन गईं सहेलियां 

क्या दिलों ने भी टूटने के लिए यही दिन चुना था ..? निषी की फ्रेंड रोषनी खुषी से झूम उठी थी और बाकी सहेलियां षाॅक्ड रह गईं थीं। दरअसल निषी ने अपनी सभी सहेलियों से षर्त लगा रखी थी, कि इस वैलेंटाइन को रोहित आॅफीषियली उसका हो ही जायेगा पर ...


वैलेंटाइंस डे निकल गया ...? गुलाब के गोदाम खाली हो गए ..? गिफ्टस के शोरूम्स में पिछले कई महीनों से रखे गुड्डे-गुडि़ए भी आफ्टरआॅल बिक ही गए। बजरंग दल और शिवसेना जैसे मोहब्बत के विलेन से बचकर देश भर में खूब इश्क लड़ाया गया। आइए इस बीते हुए ’इज़हार दिवस’ पर दो गानों को प्यार के परिंदों पर फिट बेठाने की कोशिश करते हैं। ’अपनी तो जैसे-तैसे कट जायेगी ..आप का क्या होगा ...?’’ दूसरा थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए ’’... ! 
जिन लड़कों को हसीन हसीनाओं ने रिजेक्ट करते हुए ’नाॅट नाउ’ कहा, वे तो मन में ठान बैठे कि ’’चलो अपनी तो जैसे तैसे कट जायेगी .... आपका क्या होगा ...? लेकिन जिन मैडम्स ने ब्यूटी सलून जाकर अच्छे से फिगर-फेशियल करवाया था .. और उन्हें किसी खास ’मिस्टर राइट’ से उम्मीद थी, कि वो उनके कदमों में झुककर उनके काॅस्मेटिक चेहरे का चांद से कंपेरिज़न करेगा, अपने हाथों से वादों का गुलाब और इरादों का गिफ्ट देगा, वो तो उनकी सहेली को प्रपोज़ कर गया, और साहिबां देखतीं रह गईं। ऐसी ही एक ’हेट स्टोरी’ जिसमें सहेली बन गई विलेन।
निशिका की इसी साल काॅलेज में एंट्री हुई थी। मैनेजमेंट में बैचलर कर रही निशी, सैकंड सैमेस्टर में ही अपने क्लासमेट रोहित को दिल दे बैठी। रोहित अभी भी खुद को निशी का ’आॅन्ली फ्रेंड’ ही कंसीडर कर रहा था। काॅलेज-कैंटीन में उनकी गपशप घंटों चलती थी, काॅरीडोर में हाथों में हाथ डाले रोहित-निशी, ’लव वर्ड्स’ का टाइटल बन चुके थे। निशी ने अपनी सभी सहेलियों से शर्त लगा रखी थी, कि इस वैलेंटाइन को रोहित आॅफीशियली उसका हो ही जायेगा। जैसे-जैसे ’इश्क डे’ करीब आ रहा था। निशी का दिल धड़कते-धड़कते जैसे बाहर ही आता जा रहा था। 
14 फरवरी आई, रोहित को लेकर निशी से ज्यादा उसकी सहेलियां ऐक्साइटिड थीं। आखिर हों भी क्यूं ना ...?उसका स्टाइल, उसकी स्माइल, गुच्ची-लिवाइस के टैग्स, फास्ट्रैक की एक्सेसरीज़ .... इन ब्राण्ड्स की पहचान ही मानो रोहित से थी और रोहित की आइडेंटिटी बन चुके थे ये ब्राण्ड्स । अचानक बाइक से दनदनाते हुए साहबज़ादे एंट्री किए, दांतों में लंबी डंडी वाला गुलाब था, चेहरे पर स्माइल, और बाकी बाॅडी तो बस ब्राण्ड्स से फुलफिल्ड थी। बाइक के डिस्क ब्रेक्स लगे, निशी का दिल थमा, इधर रोहित टर्न हुआ, वहां निशी ने क्यूट स्माइल दी। एक पाॅकेट से रोहित ने कुछ कागज़ जैसा निकाला, वहीं निशी ने रोहित के लिए खरीदी राडो की घड़ी बाॅक्स से निकाल ली। ......... पर अचानक फीलिंग्स की सुनामी ...... दोनों दिलों में ज़ोरों की हलचल ......! 
ये क्या ....? निशी ज़रा आगे बढ़ती है, रोहित थोड़ा साइड से कदमों को लेफ्ट की ओर खींचता है .....’’हाइ रोशनी ...! एक्च्युअली मुझे तुमसे काॅलेज के फस्र्ट डे से कुछ कहना था ....पर आज हिम्मत जुटा पाया हूं ... देखो ना ....? मैं और निशी कितने अच्छे दोस्त हैं, पर प्यार .. प्यार तो मुझे सिर्फ तुमसे ही था। मेरे सपनों में तुम्हारी मुस्कान, ख्वाबों में तुम्हारी ही बातें रहतीं हैं .... ’विल यू बी माइ वेलेंटाइन ......? निशी का चेहरा लाल .... मेकअप गायब ....राडो की घड़ी पर आंसुआंे की बूंदें, ना चाहते हुए भी बड़ी मुश्किल से उसके चेहरे पर हल्की मुस्कराहट जि़ंदा  है ...! क्या दिलों ने भी टूटने के लिए यही दिन चुना था ..? निशी की दोस्त रोशनी खुश और बाकी सहेलियां शाॅक्ड हैं। रोशनी ’आई लव यू टू माइ हैंडसम’ बोलकर प्रपोज़ल एक्सेप्ट करती है, और रोहित को हग करती है। 
आंसुओं को दिल की तरफ भेजकर निशी रोशनी को काॅग्रैट्ज़ करती है, और वापस लौट जाती है। दरअसल इस वैलेंटाइंस डे पर जिन लड़कियों को उनके ड्रीमब्वाॅय से उम्मीद और ’ओवरएक्सपैक्टेशन थी, उन्हें हल्की निराशा झेलनी पड़ी। ब्वाॅयफ्रेंड्स के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ारना रिलेसनशिप में हल्का बोरिंग साबित हुआ । ऐसे मौकों का फायदा सहेलियों ने जमकर उठाया। 
इस माॅडर्न ज़माने में भी तमाम प्रेमियों की ’हेट स्टोरी’ निशी-रोशनी-रोहित से मिलती-जुलती रही। ऐसे में लड़कियों को कुछ की प्वाइंट्स ध्यान में रखने होंगे। नंबर एक तो यही कि अपनी सहेलियों से ज़रूरत से ज्यादा ’शेयरिंग’ रिश्ते के लिए इंज्यूरियस हो सकती है। हां एक बात और जिन गाॅर्जियस गल्र्स को उनके मि. राइट ने ठुकराकर साइड वाली मैम साहब को वैलेंटाइन बना लिया, वे अब सफाई में सिर्फ इतना ही कह पा रहीं हैं ’’ऐक्च्युअली मुझे प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ना ही नहीं था। वैसे भी अगले महीने बोर्ड एग्ज़ाम्स जो हैं। 
अब निशी और उस जैसी बाकी लववर्ड्स को इतना कहना तो बनता ही है ....’’थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए .......! ड्यूरिंग लव-शव, सहेलियों से दूरी बना लीजिए ...!
-मयंक दीक्षित,  
कानपुर। 

Monday, 21 January 2013


स्कूल तो गए .. फिर सीखे क्यूं नहीं .. ?


ऐसा नहीं है कि प्राइवेट एजूकेषन से स्टूडेंट्स का फ्यूचर अंधेरे में जा रहा है, पर सरकारी स्कूलों में केयरलेस मैनेजमेंट, मोटी तनख्वाह पर अंगड़ाइयां लेते अध्यापकों ने ऐसी नौबत ला दी है। ए.स.ई.आर. की सर्वे रिपोर्ट में बच्चे स्कूल तो उत्साह से गए हैं, पर उनके सीखने का स्तर निराष करता है ... 


स्लेट-खडि़या से उगाया हुआ शिक्षा का पौधा, वक्त की पटरी पर रगड़ता हुआ, आज डिजिटल डायरी और ई-क्लासरूम्स तक जा पहुंचा है। आज से दो दशक पहले की तसवीरों में ना तो निजी स्कूलों के चमचमाते भवन थे, और ना ही हर गली-नुक्कड़ पर आमंत्रण देते कोचिंग सेंटर। दादा-काका पहाड़े और मुहावरे याद कर सरकारी नौकरियां पा जाया करते थे। 
आधुनिकता की कसौटी पर हर क्षेत्र ने नए-नए आयाम स्थापित किए। एजूकेशन को मिशन के साथ-साथ ब्राइट कॅरिअर सेक्टर के रूप में देखा जाने लगा। नौनिहालों की बेसिक शिक्षा अब उनके माता-पिताओं की सैलरी और लाइफस्टाइल पर निर्भर हो चुकी है। 1991 मंे मुंबई के स्लम्स में गरीब बच्चों के सपने सच करने उतरा गैर सरकारी संगठन ’प्रथम’ वाकई काबिल-ए-तारीफ है। निदेशक रहते हुए माधव चवन ने इसके योगदान की खुश्बू भारत के 21 राज्यों तक फैलाई है। 
प्रथम ने 2011-2012 की रिपोर्ट में बेसिक शिक्षा की बिगड़ती हालत का जि़म्मेदार ना सिर्फ भारत सरकार की शिक्षा सम्बंधी नीतियों को बताया है, बल्कि यहां के शिक्षकों की कड़वी हकीकत सामने ला दी है। 567 कसबों में हुए सर्वे में एकमात्र अच्छी खबर ये है कि 2009 से 2012 में 6-14 एजग्रुप के 96.05 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल तक अपने कदम बढ़ाये हैं। ज़ाहिर है इसमें मिड्डेमील जैसे लुभावने कारणों का भी अहम योगदान रहा होगा। सरकार के राइट टू एजूकेशन की पीठ बेशक इसलिए थपथपाई जा सकती है, कि उसके तमाम प्रयास-पाॅलिसी के सहारे बच्चों की बड़ी संख्या ने स्कूलों का रूख किया है।
कक्षा पांच के 47 फीसदी बच्चे ही क्लास सैकंड की किताबें पढ़, समझ और हल कर पा रहे हैं। 2010 में जहां दस में से सात बच्चे जोड़ घटाने को फुर्ती से हल कर ले रहे थे, वहीं यह ग्राफ भी गिरकर दस में से पांच हो गया है। गांव-देहात और छोटे कसबे के मां-बाप अपने बच्चों का ब्राइट फ्यूचर निजी स्कूलों में तलाश रहे हैं। 6-14 एजग्रुप का प्राइवेट एजूकेशन में योगदान 2006-12 के बीच दस प्रतिशत बढ़कर 18.07 से 28.03 हो चुका है। इस बीच ट्यूशन की आवोहवा ने भी कसबों-देहात में दस्तक दी है।
ऐसा नहीं है कि प्राइवेट एजूकेशन से स्टूडेंट्स का फ्यूचर अंधेरे में जा रहा है, पर सरकारी स्कूलों में केयरलेस मैनेजमेंट, मोटी तनख्वाह पर अंगड़ाइयां लेते अध्यापकों ने ऐसी नौबत ला दी है। व्यवहारिक उदाहरण में हम-आप के ही घरों में लोग बात करते दिख जाते हैं, ’’उन साहब की नौकरी बढि़या है, दस बजे गए, दो बजे आ गए, आराम से धूप सेंकी और चले आये’’। शिक्षकों की भर्ती परीक्षाएं भी घपले-घोटालों की भेंट चढ़ जातीं हैं, जैसा कि यूपी में टी.ई.टी. के साथ हुआ। प्राइवेट ट्यूशंस से स्टूडेंट्स का भला तो हो रहा है, पर सिर्फ उन्हीं का जिनके पेरेंट्स सक्षम हैं। सरकारी-प्राइवेट स्कूलों वाले तमाम मास्साब भी सिंसियर होकर सिर्फ कोचिंग सेंटर में ही पढ़ाते हैं।
भारत-चीन से सामना करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने नौनिहालों को गणित में कमज़ोर पाये जाने पर चेतावनी दी थी। उनसे कहीं ज्यादा चिंता हमारे देश के हुक्मरानों को होनी चाहिए। 2010 में पांचवी क्लास के 29.01 फीसदी बच्चे बिना किसी की मदद से दो अंकों का जोड़-घटाना नहीं कर पाये थे, 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 39 प्रतिशत हुआ और 2012 की रिपोर्ट में चैंका देने वाल 46.05 प्रतिशत जा पहुंचा है।
शिक्षा के सतर को सुधारने के लिए सिर्फ कागजी नीतियां और पैसा फेंकना ही सरकार के लिए काफी नहीं है, उसे शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की मदद से ग्रासरूट मंथन करना होगा। हमारे देश के अध्यात्मिक गुरूओं के श्रीमुख जब नक्सलियों की सीढ़ी सरकारी स्कूल के बच्चों को बताते हैं, तो दर्द और धिक्कार महसूस होता है। बच्चे ही किसी देश के भविष्य का आइना समझे जाते हैं, यदि हम उन्हें ही शिक्षित और समझदार बनाने में आनाकानी करेंगे, तो कल्पना काफी भयावह हो सकती है। 
-मयंक दीक्षित
                                      स्वतंत्र पत्रकार, कानपुर।