Monday, 11 March 2013


शक और संवेदना को ’न्यायाधीश’ न बनायें



जानकार कहते है कि अपराधी छवि रखने वालों को चुनाव लड़ने से रोक देना चाहिए, पर वे यह क्यूं भूल जाते हैं कि यदि कद्दावर बहुमत से जीत भी रहे हैं तो सिर्फ जनता के बेषकीमती वोटों की बदौलत ! जब तक आरोपी और अभियुक्त को एक निगाह से देखा जाता रहेगा, राजा भैया जैसे तमाम ’बाहुबली’ मीडिया और मनगणंत कहानियों के ’पैकेज-पात्र’ बनते रहेंगे।


यदि कुंडा की जनता भोली-भाली है, तो वह राजा भैया के आतंक को वोट देती आई है, और यदि वह समझदार है तो फिर उनकी मेहरबानियों और व्यवहार को। कस्बे के नल से लेकर कस्बे के कल को संवारने का जिम्मा 1996 से राजा भैया खुद संभाल रहे हैं। 26 साल की उम्र में राज और राजनीति का रास रचाते हुए आज वे पांचवीं बार निर्दलीय विधायक हैं। सियासत के सफर में उन्होंने न सिर्फ जनता का दिल जीता, बल्कि 47 मुकदमे दर्ज कराने का बदनाम रिकाॅर्ड भी बनाया। पिछले दिनों हुई डीएसपी जिया उल की हत्या की तलवार, उनके नाम, उनकी शान और उनकी आगे की सियासती तस्वीर पर लटक रही है। राजा का  इस्तीफा व संभावित गिरफ्तारी की खबरें और सीबीआई की ताबड़तोड़ इनवेस्टिगेशन, कीचड़ में उस भारी-भरकम पत्थर की तरह उछलीं है, जिसने समाजवादी सरकार और अखिलेश यादव पर कभी न धुलने वाले दाग उछाल दिए हैं।
 घर बैठे अखबार या टी.वी. की ब्रेकिंग में ’बाहुबली’ शब्द का मतलब खंूख्वार या कद्दावर समझ लेना ठीक उसी तरह है, जैसे विज्ञापनों में गोरेपन की क्रीम लगाकर  हकीकत में गोरे होने का अंदाज़ा लगा लेना। जब हमारे घर की बिजली खराब हो जाती है, तो हम पड़ोस में रह रहे ऐरे-गैरे भाईसाहब को न बुलाकर उन भाई साहब की तलाश करते हैं, जिनका ज़रा रुतबा हो, उनकी एक आवाज़ पर लाइनमैन या मैकेनिक दौड़े चले आएं। बैंकों, निगमों में काम जब कोई काम फसता या रुकता है, तो हमें प्रभावशाली व्यक्तियों की तलाश होती है, जिनकी हनक हो, पहुंच हो। हर गली-मोहल्ले में कोई न कोई ऐसा शख्स मोजूद हैं, जिसकी एक आवाज़ पर आम से खास तक उसकी हां-हुजूरी को तैयार हैं। क्या इसे बाहुबल की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता ..?
दरअसल हमने बाहुबलियों को अपराध और दुराचार के उस्तादों तक ही सीमित रख लिया है। आज यदि राजा भैया जैसे बाहुबली हैं, तो सियासत में उनकी हनक है, वे लोगों की बात ऊपर तक पहुंचाते हैं, वे मुद्दों को अमली जामा पहनाने की कुब्बत रखते हैं। जनता का वोट पाने के लिए प्रतिनिधि को जनप्रतिनिध हेाना पड़ता है, सड़क-खडंजा, नाले-नाली, पानी-बिजली, खसरा-खुजली, हर मुद्दों को सुलझाने की दिशा-दशा पर गौर करना पड़ता है।
अभी तक इस्तेमाल किए गए वाक्यों से आपको यह राजा भैया के पक्ष मंे लिखा हुआ लेख लग सकता है, पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यदि जनता है, तो उसके नतीज़े व निर्णय का भी सम्मान करना चाहिए। यदि आरोपी और अभियुक्त को एक निगाह से देखा जायेगा, तो ज़ाहिर है, राजा भैया जैसे तमाम ’बाहुबली’ मीडिया और मनगणंत कहानियों के  ’पैकेज-पात्र’ बनते रहेंगे। यह सच है कि महीनों से सीओ हक, राजा की क्राइम-हिस्ट्री तैयार करवाने में अहम भूमिका निभा रहे थे, पुलिसिया कार्रवाई पर राजा की तिरछीं नज़र थी, पर सिर्फ उनके समर्थकों की घटनास्थल पर मौजूदगी को कैसे मान लिया गया कि हक की हत्या, राजा की सोची-समझी साजिश थी। ऐसे तो जब दिल्ली रेप केस में इंडिया गेट पर धरना दे रहे आम आदमी पार्टी के फर्जी कार्यकर्ता बनकर एक युवक ने पुलिस पर ईंट-पत्थर चलाये थे, तब अरविंद को कटघरे में नहीं लिया गया! चूंकि आगे की जांच में सामने आ गया था कि अमुक युवक अरविंद की छवि बिगाड़ने आया था।
हो सकता है, कुंडा की प्रधानी रंजिश में राजा व प्रधान  समर्थकों के बीच भी शायद ऐसा ही कोई भेश-बदलिया घुस आया हो, जिसने इस तरह का घिनौना अपराध किया। सीबीआई जांच में दूध का दूध पानी का पानी होने की उम्मीद हम सभी को है, पर सीओ की हत्या के सुराग लगने तक बाहुबल की गलत परिभाषा गढ़ने से हमें बचना होगा। हत्या, हत्या का प्रयास, रेप, रेप का प्रयास, गैंगरेप, गैंगस्टर एक्ट जैसी संगीन धाराओं ने राजा भैया की सामाजिक छवि धूमिल की है। उन पर आरोप लगना लाजि़मी है, पर मौजूदा केस में संवेदना के आगे न्यायिक व्यवस्था और संविधान को बौना समझना हमारी भूल भी बन सकती है।
बसपा सरकार की नज़रों में राजा हमेशा से खटकते रहे, सपा राज में उन्हें चैन-ओ-सुकून मिला तो बसपा में जेल की रोटियां। हो सकता है, विपक्षी सत्ताहीन-समर्थकों ने राजा को मंत्री पद पर देख, नुकसान पहुंचाने की कोशिश की हो। उदाहरण के तौर पर, एक बार चोरी करने के जुर्म में जो एक बार जेल की शक्ल देख आते हैं, शहर में बड़ी डकैती होने पर सबसे पहले उन्हें ही धरा जाता है। वह भी सिर्फ शक के आधार पर। इसलिए भी कि, वे अपना विश्वास और सम्मान खो चुके होते हैं।
राजा की दबंगई छवि को भुनाने के लिए ही शायद सीओ को जान से मारने का खेल रचा गया हो, ताकि इल्ज़ाम का घड़ा राजा और उनके समर्थकों पर फूटे! ऐसे में सीओ की ईमानदारी और राजा से उनकी दूरी को प्लसप्वाइंट के तौर पर देखा गया हो। फिलहाल ऐसे ही कई पहलुओं पर सीबीआई और प्रतापगढ़ पुलिस भी छानवीन कर रही है। कभी-कभी संवेदना का पहाड़ इतना भारी और और ताकतवर हो जाता है कि सच और तथ्य उसके नीचे दबने लगते हैं। सपा सरकार का दिनोंदिन लोकप्रिय होना, चुनावी वादों का सिलसिलेवार पूरा होना किसी भी विरोधीवर्ग की जलन का कारण बन सकता है। ऐसे में घटना को अंजाम देकर सरकार और नौकरशाहों को हाशिए पर लाने की कोशिश भी इस हत्या का मुखौटा हो सकती है।
फिलहाल शहीद सीओ की पत्नी और भाई को नौकरी और मुआवजे का भले ही ’समुदाय-विशेष बतंगड़’ बनाया जा रहा हो, पर हमें इसे नैतिक कदम मानना होगा। आरोप लगने के बाद राजा का इस्तीफा, मुख्यमंत्री समेत प्रदेश सरकार का सीबीआई जांच पर गंभीर रुख विश्वास जगाता है कि जल्द ही दोषी सामने आयेगा। मुआवजे की रकम और नौकरी, एक ईमानदार, कर्मठ आॅफीसर की कीमत तो नहीं चुका सकती पर इस शहादत के बदले सरकार को पीडि़त परिवार को न्याय ज़रूर दिलवाना होेगा। हवा में तीर मारकर हम असली गुनाहगार से कहीं छिटक न जाएं, यह बात ध्यान में रखनी होगी। सीबीआई से भी जनता यही उम्मीद कर रही है कि डिप्टी सीएमओ सचान और आरुषि हत्याकाण्ड की तरह वह यहां विफल साबित न हो !

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