’पूसी कैट’ अशुभ कैसे हो गई ...?
जब तुम नासमझ थे, तब हमसे खेलते थे, आज जब समझदार हो तो हमारी फीलिंग्स से खेल रहे हो। है। अषुभ हम नहीं, तुम्हारे ख्याल हैं, जो हम बेज़ुबानों की ’म्याउं-म्याउं’ को आधुनिकता और ’समझदारी’ के साइरन से कंपेयर कर रहे हैं।
मेरा धीरे से ’म्याउं’ करना ही मेरी कमज़ोरी थी, दरवाज़े के पीछे छिपकर तुम्हारी जि़ंदगी में मुझे झांकना ही नहीं चाहिए था। दरअसल मुझे तो तुमसे शिकायत करनी चाहिए कि बचपन में अंग्रेजी की किताब लेकर तुम क्यूं पूरे घर में ’पूसी कैट-पूसी कैट’ सुनाया करते थे ? जब तुम रोना बंद नहीं करते थे, तो मां भी तुम्हें यह कहकर डरा देती थी कि ’’चुप करो नहीं तो म्याउं आ जायेगी’’। देखो न ! मैं आज भी वैसी ही हूं, तुम्हारी छत पर से झांकती हूं, जब तुम निकलते हो तो तुम्हें अपना एहसास कराती हूं, पर जैसे ही मैं किसी गली या सड़क पर तुम्हारा बचपन याद दिलाने निकलती हूं तो तुम मुझे अशुभ मानकर वापस लौट जाते हो।
तुम्हारी मां जो लोरी में मुझे म्याउं कहकर दुलारती थी, उससे मिलने जब मैं किचेन में जाती हूं, तो मेरे पीछे डंडा लेकर दौड़ पड़ती है। उन दिनों ’’पूसी-कैट-पूसी कैट’’ जैसे ही तुम ज़ोर-ज़ोर से पढ़ते थे, मैं तुरंत तुम्हें सुनने तुम्हारे आंगन दौड़ पड़ती थी, तब तुम्हारी छत पर जाल नहीं था, मैं गुपचुप सीढि़यों से नीचे आ जाती थी। जैसे ही तुम मुझे देख लेते थे, किलकारियां मारकर हंस देते थे, क्या तब मैं तुम्हारे लिए ’शुभ’ थी ..? तब तो तुम मेरे रास्ता काटने पर कभी वापस नहीं लौटे। जैसे-जैसे तुम समझदार होते गए, तुमने अपनी प्यारी पूसी को अशुभ मान लिया। अब तुम्हें हम बिल्लियां, अशुभ-अपशकुन का आइना नज़र आतीं हैं।
याद है उस दिन जब तुमने मेरे लिए एक कटोरी में दूध रखा था, और दूर से मेरे आने का इंतज़ार कर रहे थे। मैंने अपने घर में तुम्हारे बारे में खूब बातें की थीं, उस एक कटोरी दूध से भले ही मेरा पेट न भरा हो, पर मेरा मन ज़रूर भर गया था। उस दिन मैंने तुम्हें और मां को मन ही मन ढेर सारा ’थैंक्यू’ बोला था। आज कई सालों बाद जब तुम एक बड़े अफसर बन गए हो, तुम्हें मेरा ख्याल ही नहीं आता। कल तुम नहीं थे, तो मैं छत पर तुम्हें आवाज़ लगाने आई थी, मेरी ’म्याउं-म्याउं’ सुनकर मां ने तुम्हारे भाई को डंडा लेकर मुझे भगाने भेजा। उन्हेांने बुदबुदाया कि ’बिल्ली का रोना अशुभ होता है, भगाओ इसे ’’! क्या हम बेज़ुबान भी शुभ-अशुभ हो सकते हैं ..?
शायद हमें बनाने के बाद उपर वाले ने गलती से तुम इंसानों के बीच भेज दिया है। वे इंसान जो बचपन में मुझसे खूब खेलना चाहते हैं, मेरी म्याउं सुनकर हंसना चाहते हैं, और जैसे-जैसे वे और उनकी अक्ल बड़ी होती है, हम उनके लिए अशुभ ओर अपशकुन बन जाते हैं। ऐसे ही मेरी एक सहेली पर पिछले दिन एक अंकल ने कार चढ़ा दी। उन्होंने पलटकर भी उसे नहंी देखा, और तड़पता छोड़कर धूल उड़ाते हुए निकल लिए। दरअसल वह कभी उनकी पालतू बिल्ली हुआ करती थी, एक दिन खेल-खेल में उसने उनके टी-मग में मूंह मार दिया तो उन्हेांने उसे पीटकर घर से बाहर कर दिया। जब भी वे गाड़ी लेकर आॅफिस को निकलते थे, तो वह उन्हें सीआॅफ करने जाया करती थी। उस दिन भी वह उन्हें शायद यही करने गई थी, पर अपनी नन्हीं सी जान को उनके प्यार पर कुर्बान कर आई।
माना कि हमें दूध पीना पसंद है, माना कि हम दिखने में भद्दे हैं, हमारी म्याउं-म्याउं इस दुनिया में अपशकुन की पहचान बन चुकी है, पर हमारी नन्हीं जान ने आज तक तुम लोगों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। जब-जब तुम्हारा बेटा रोया तो उसके हांेठों पर अपनी धीमी सी ’म्याउं’ से मुस्कान ला दी। पूसी-कैट जैसी कविताएं सुनकर हम खूब खुश हुए, पर जैसे-जैसे तुम ब़ड़े होते गए, तुमने हमें अपनी जि़ंदगी से बाहर ही नहीं किया, हमारी बेइज्जति भी की। जो रास्ते तुम्हारे लिए हैं, वे ही हमारे लिए भी हैं, जिन गलियों में तुम खेल-कूद कर बड़े हुए, वहां हमें भी घूमने का अधिकार है, तुम कौन होते हो हमें अशुभ कहने वाले। अपशकुन हमारे रास्ता काटने से नहीं, तुम्हारा नज़रिया बदलने से होता है। अशुभ हम नहीं तुम्हारे ख्याल हैं, जो हम बेज़ुबानों की ’म्याउं’ को आधुनिकता और ’समझदारी’ के साइरन से कंपेयर कर रहे हैं।
-- -तुम्हारी अपनी ’पूसी’।

thanks to react ..... keep suggesting frnd
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