Thursday, 21 March 2013


रील और रियल में फ़र्क है साहब ...


दौलत-शोहरत के छलकते जाम में जब मजबूत और चैड़ी कदकाठी का काॅकटेल मिला, तो संजय ने रील किरदारों को रियल लाइफ में भी निभाना शुरु कर दिया। नशे की लत से तो वे जैसे-तेसे बाहर आ गए, पर अपनी छवि सुधारने को लेकर आज भी वे संघर्ष करते दिख रहे हैं। 20 साल बाद लौटा कानून का ’जिन्न’ क्या संजू बाबा को समाज की मुख्यधारा से जोड़ पायेगा ? बता रहे हैं मयंक दीक्षित 


घोड़ा कितना भी विश्वसनीय या सीधा क्यूं न हो, घुड़सवार को उसकी लगाम हाथ में रखनी ही होती है। वक्त और हालात खराब होने के लिए आप और आपके फायदे का इंतज़ार नहीं करते। हमें एक घुड़सवार की तरह जि़ंदगी की लगाम को भी जि़म्मेदारी और सूझबूझ से कसे रहना होता है, इससे पहले कि आपकी फितरत और जुनून इसे बेकाबू न होने दे। 12 मार्च 1993 में मायानगरी विस्फोट से दहली थी, जिसमें 257 निर्दोष लोगों की बेहद दर्दनाक मौत हुई थी। टाडा कोर्ट ने अभिनेता संजय दत्त को धमाकों के दौरान ए.के. 56 रखने पर छह साल की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैंसले में संजय को एक साल की रियायत देकर पांच साल की सज़ा बरकरार रखी है। कैसे बाॅलुवुड के सदाबहार नायक सुनील दत्त का चिराग साल दर साल विवादों और मामलों में नज़र आता रहा, और क्या वज़ह रही कि संजय रील लाइफ के किरदार रियल लाइफ में भी बदस्तूर निभाते चले आये।
पद्मश्री सुनील दत्त साहब ने गुज़रे ज़माने में न सिर्फ बेहतरीन अभिनय से देश का दिल जीता बल्कि एक साल के साफ-सुथरे राजनैतिक कॅरिअर में भी वे बेहद व्यवहारकुशल ओर संजीदा साबित हुए। 1981 में जब संजय दत्त ने फिल्मी दुनिया में अपने कदम ज़माने की मंशा जताई, तब उन्होंने ही फिल्म राॅकी से बेटे को लांच किया। धीरे-धीरे रोमांस और नटखटी किरदारों से संजय दत्त ’बाॅलीवुड के डाॅन बन गए’, और ’मुंबई के ’संजू बाबा’। पर्दे की गुंडागीरी ने संजय की छवि को ऐसा दबंग और कद्दावर बनाया कि वे आज रियल वल्र्ड में भी अपनी मासूमियत और बेगुनाही साबित करते घूम रहे हैं।
पंजाबी परिवार में पले-बढ़े संजय ने चंडीगढ़ से स्कूली शिक्षा ली और पिता की अभिनय गाथा पढ़तेे-देखते और सुनते हुए बड़े हुए। 1987 में वे अभिनेत्री रिचा शर्मा के साथ शादी के बंधन में बंध गए, यहीं से उन पर समस्याओं की धीमी बरसात शुरु हुई। रिचा की ब्रेन ट्यूमर के चलते मौत हो गई। मां से बिछड़ने के बाद बेटी भी संजय के दुलार और प्यार से दूर नाना-नानी के साथ विदेश रहने चली गई, ऐसे वक्त में बेटी को साथ न रखने पर भी संजय के परिवार में भीतरखाने कहासुनी चलती रही। कुछ सालों बाद रिया पिल्लई के साथ उन्हेांने नए रिश्ते की शुरुआत करनी चाही पर आपसी मतभेदों के चलते दोनों मंे तलाक हो गया। आज वे मान्यता की जि़ंदगी का हिस्सा हैं, और बीस साल पहले हुई आम्र्स रखने की गलती को रुंधे गले से स्वीकारने को मजबूर भी ।
संजय को दादागीरी के साथ-साथ नशे का भी बेइंतिहां शौक रहा, 1981 के आस-पास वे नशीले पदार्थ रखने के जुर्म में पांच महीने हवालात मंे रहे। विवादों और उलझनों में संजय की सक्रिय भूमिका रही। दरअसल दर्शकों के बीच आईं उनकी फिल्मों ने भी लोगों के दिमाग में यह कूट-कूट कर भर दिया कि वे असल जि़ंदगी में भी ना-नुकर बर्दाश्त न करने वाले कद्दावर अभिनेता हैं। तमाम निर्देशकों का संजू को दादा कहकर मीडिया मंे प्रोजेक्ट करना, उन्हें फिल्मों में बंदूक-कारतूसों से सजाये रखना भी उनके लिए कुछ खास अच्छा साबित नहीं हुआ।
 फिल्म विधाता, जीवा, मेरा हक, कानून अपना अपना में संजय ने बेहद संजीदगी से कभी पुलिस के किरदार में दुश्मनों के छक्के छुड़ाये तो कभी ’दुश्मन’ बनकर पुलिस पर गोलियां बरसाईं। बाॅलवुड निर्देशकों को उस वक्त संजय के रूप में एक चैड़े सीने वाला ऐसा कलाकार मिल गया था, जिसमें हंसाने का भी हुनर था और आतंक फैलाने की प्रतिभा भी। संजय की बहुत ही कम ऐसी फिल्में रहीं जिनमें वे जाम छलकाते या धुएं के छल्ले उड़ाते नज़र नहीं आये। आतंक ओर अपराध को पर्दे पर दत्त ने दानव की तरह पेश किया, इसी बीच जब उन पर कोई भी केस दर्ज हुआ तो लोगों का भरोसा उनकी बेगुनाही से उठता गया। यही कारण है कि आज बाॅलीवुड का यह सूरमा सज़ा के चंगुल में फंस चुका है और उनके प्रशंसक भी संजू के लिए सिर्फ कोरी संवेदना ही व्यक्त कर पा रहे हैं।
1999 का एक दौर आया जब संजय दत्त को लोगों ने हाथों-हाथ लिया और उनकी छवि सुधारने मेें हसीना मान जायेगी, चल मेरे भाई, साहिबां जैसी मनोरंजक फिल्मों ने बड़ी भूमिका अदा की। हालांकि सिर्फ गुंडागीरी के किरदार ही किसी अभिनेता की छवि का पैमाना नहीं होते, पर संजय पर लगे आरोप जब सही साबित होने लगे, तो लोगों ने उनकी फिल्मों को ही संदेश के तोर पर लिया और अभिनय की विरासत लिए यह कलाकार कानून को भी अपने हाथ में लेता रहा। 2002 में आई मुन्ना भाई एमबीबीएस और लगे रहो मुन्ना भाई, से उनकी छवि सुधारने की बेजोड़ और सफल कोशिश हुई, जिसके बाद संजय दत्त काफी समय तक समाज के हितैषी बने रहे। मुन्नाभाई सीरीज़ के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी उन्हें सम्मान मिला। उनकी हालिया फिल्म अग्निपथ और जिला गाजि़याबाद भी अभिनय की कसौटी पर खरीं उतरीं। एवार्डों ओर सम्मानों में भी संजय ने फिल्मफेयर से लेकर, बेस्ट एक्टर का खिताब भी कई बार हासिल किया, पर अफसोस असल जि़ंदगी में वे बेस्ट ह्यूमन होने से हमेशा चूकते रहे।
न्यायालय के निर्णय का सम्मान करना देश के हर नागरिक का कर्तव्य है, और संजय ने भी फिलहाल मीडिया ओर प्रशंसकों से यही बात कही है, पर असल में यह चैड़ी कदकाठी का अभिनेता पूरी तरह टूट चुका है। नशे की लत ने मुन्ना भाई को भले ही बाॅलीवुड से पांच साल दूर रखा और वे वापस पटरी पर आये, पर 20 साल बाद लौटे इस जिन्न ने उनकी निजी और सामाजिक पृष्ठभूमि पर कई बेदाग छींटे उछाल दिए हैं। हथियार रखने जैसी संगीन गलती भले ही उन्होंने किसी परिस्थितिवश की हो, पर दत्तवंश का यह चिराग अब जेल में अपना प्रायश्चित करने को झुकी आंखों से तैयार है।
 संजय के प्रशंसक तब भी उन्हें निर्दोष और संजीदा मानते थे और अब भी, पर अदालतें जज़्बातों पर नहीं सुबूतों पर चलतीं हैं। यदि देश के इस नागरिक ने अपराध में पैर भिड़ाये हैं, तो सजा मिलेगी ही, और उन्हें अपनी गलती का एहसास भी करायेगी। एक बात और, राजनीति हर किसी के लिए फिट नहीं होती, अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए संजय ने भी सियासत के गलियारों में कदमताल की, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ने के बजाय, साख और निष्पक्षता में कमी आई। संजय समझ चुके होंगे कि अच्छे वक्त में जो राजनीति उनके ग्लैमर का फायदा उठा रही थी, आज वह सिर्फ संवेदना और सहानुभूति के बयानों तक सिमट कर रह गई है। फिर चाहे वह जयाप्रदा का बयान हो या मुलायम सिंह का रस्मअदायगी कंपेनसेशन, आज संजय के साथ सिर्फ उनकी गलतियां और गिले-शिकबे ही सिर झुकाये खड़े हैं। सीधे शब्दों में कहें तो संजय आज कानून के नहीं, अपने आप के अपराधी साबित हुए हैं।

Monday, 11 March 2013


शक और संवेदना को ’न्यायाधीश’ न बनायें



जानकार कहते है कि अपराधी छवि रखने वालों को चुनाव लड़ने से रोक देना चाहिए, पर वे यह क्यूं भूल जाते हैं कि यदि कद्दावर बहुमत से जीत भी रहे हैं तो सिर्फ जनता के बेषकीमती वोटों की बदौलत ! जब तक आरोपी और अभियुक्त को एक निगाह से देखा जाता रहेगा, राजा भैया जैसे तमाम ’बाहुबली’ मीडिया और मनगणंत कहानियों के ’पैकेज-पात्र’ बनते रहेंगे।


यदि कुंडा की जनता भोली-भाली है, तो वह राजा भैया के आतंक को वोट देती आई है, और यदि वह समझदार है तो फिर उनकी मेहरबानियों और व्यवहार को। कस्बे के नल से लेकर कस्बे के कल को संवारने का जिम्मा 1996 से राजा भैया खुद संभाल रहे हैं। 26 साल की उम्र में राज और राजनीति का रास रचाते हुए आज वे पांचवीं बार निर्दलीय विधायक हैं। सियासत के सफर में उन्होंने न सिर्फ जनता का दिल जीता, बल्कि 47 मुकदमे दर्ज कराने का बदनाम रिकाॅर्ड भी बनाया। पिछले दिनों हुई डीएसपी जिया उल की हत्या की तलवार, उनके नाम, उनकी शान और उनकी आगे की सियासती तस्वीर पर लटक रही है। राजा का  इस्तीफा व संभावित गिरफ्तारी की खबरें और सीबीआई की ताबड़तोड़ इनवेस्टिगेशन, कीचड़ में उस भारी-भरकम पत्थर की तरह उछलीं है, जिसने समाजवादी सरकार और अखिलेश यादव पर कभी न धुलने वाले दाग उछाल दिए हैं।
 घर बैठे अखबार या टी.वी. की ब्रेकिंग में ’बाहुबली’ शब्द का मतलब खंूख्वार या कद्दावर समझ लेना ठीक उसी तरह है, जैसे विज्ञापनों में गोरेपन की क्रीम लगाकर  हकीकत में गोरे होने का अंदाज़ा लगा लेना। जब हमारे घर की बिजली खराब हो जाती है, तो हम पड़ोस में रह रहे ऐरे-गैरे भाईसाहब को न बुलाकर उन भाई साहब की तलाश करते हैं, जिनका ज़रा रुतबा हो, उनकी एक आवाज़ पर लाइनमैन या मैकेनिक दौड़े चले आएं। बैंकों, निगमों में काम जब कोई काम फसता या रुकता है, तो हमें प्रभावशाली व्यक्तियों की तलाश होती है, जिनकी हनक हो, पहुंच हो। हर गली-मोहल्ले में कोई न कोई ऐसा शख्स मोजूद हैं, जिसकी एक आवाज़ पर आम से खास तक उसकी हां-हुजूरी को तैयार हैं। क्या इसे बाहुबल की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता ..?
दरअसल हमने बाहुबलियों को अपराध और दुराचार के उस्तादों तक ही सीमित रख लिया है। आज यदि राजा भैया जैसे बाहुबली हैं, तो सियासत में उनकी हनक है, वे लोगों की बात ऊपर तक पहुंचाते हैं, वे मुद्दों को अमली जामा पहनाने की कुब्बत रखते हैं। जनता का वोट पाने के लिए प्रतिनिधि को जनप्रतिनिध हेाना पड़ता है, सड़क-खडंजा, नाले-नाली, पानी-बिजली, खसरा-खुजली, हर मुद्दों को सुलझाने की दिशा-दशा पर गौर करना पड़ता है।
अभी तक इस्तेमाल किए गए वाक्यों से आपको यह राजा भैया के पक्ष मंे लिखा हुआ लेख लग सकता है, पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यदि जनता है, तो उसके नतीज़े व निर्णय का भी सम्मान करना चाहिए। यदि आरोपी और अभियुक्त को एक निगाह से देखा जायेगा, तो ज़ाहिर है, राजा भैया जैसे तमाम ’बाहुबली’ मीडिया और मनगणंत कहानियों के  ’पैकेज-पात्र’ बनते रहेंगे। यह सच है कि महीनों से सीओ हक, राजा की क्राइम-हिस्ट्री तैयार करवाने में अहम भूमिका निभा रहे थे, पुलिसिया कार्रवाई पर राजा की तिरछीं नज़र थी, पर सिर्फ उनके समर्थकों की घटनास्थल पर मौजूदगी को कैसे मान लिया गया कि हक की हत्या, राजा की सोची-समझी साजिश थी। ऐसे तो जब दिल्ली रेप केस में इंडिया गेट पर धरना दे रहे आम आदमी पार्टी के फर्जी कार्यकर्ता बनकर एक युवक ने पुलिस पर ईंट-पत्थर चलाये थे, तब अरविंद को कटघरे में नहीं लिया गया! चूंकि आगे की जांच में सामने आ गया था कि अमुक युवक अरविंद की छवि बिगाड़ने आया था।
हो सकता है, कुंडा की प्रधानी रंजिश में राजा व प्रधान  समर्थकों के बीच भी शायद ऐसा ही कोई भेश-बदलिया घुस आया हो, जिसने इस तरह का घिनौना अपराध किया। सीबीआई जांच में दूध का दूध पानी का पानी होने की उम्मीद हम सभी को है, पर सीओ की हत्या के सुराग लगने तक बाहुबल की गलत परिभाषा गढ़ने से हमें बचना होगा। हत्या, हत्या का प्रयास, रेप, रेप का प्रयास, गैंगरेप, गैंगस्टर एक्ट जैसी संगीन धाराओं ने राजा भैया की सामाजिक छवि धूमिल की है। उन पर आरोप लगना लाजि़मी है, पर मौजूदा केस में संवेदना के आगे न्यायिक व्यवस्था और संविधान को बौना समझना हमारी भूल भी बन सकती है।
बसपा सरकार की नज़रों में राजा हमेशा से खटकते रहे, सपा राज में उन्हें चैन-ओ-सुकून मिला तो बसपा में जेल की रोटियां। हो सकता है, विपक्षी सत्ताहीन-समर्थकों ने राजा को मंत्री पद पर देख, नुकसान पहुंचाने की कोशिश की हो। उदाहरण के तौर पर, एक बार चोरी करने के जुर्म में जो एक बार जेल की शक्ल देख आते हैं, शहर में बड़ी डकैती होने पर सबसे पहले उन्हें ही धरा जाता है। वह भी सिर्फ शक के आधार पर। इसलिए भी कि, वे अपना विश्वास और सम्मान खो चुके होते हैं।
राजा की दबंगई छवि को भुनाने के लिए ही शायद सीओ को जान से मारने का खेल रचा गया हो, ताकि इल्ज़ाम का घड़ा राजा और उनके समर्थकों पर फूटे! ऐसे में सीओ की ईमानदारी और राजा से उनकी दूरी को प्लसप्वाइंट के तौर पर देखा गया हो। फिलहाल ऐसे ही कई पहलुओं पर सीबीआई और प्रतापगढ़ पुलिस भी छानवीन कर रही है। कभी-कभी संवेदना का पहाड़ इतना भारी और और ताकतवर हो जाता है कि सच और तथ्य उसके नीचे दबने लगते हैं। सपा सरकार का दिनोंदिन लोकप्रिय होना, चुनावी वादों का सिलसिलेवार पूरा होना किसी भी विरोधीवर्ग की जलन का कारण बन सकता है। ऐसे में घटना को अंजाम देकर सरकार और नौकरशाहों को हाशिए पर लाने की कोशिश भी इस हत्या का मुखौटा हो सकती है।
फिलहाल शहीद सीओ की पत्नी और भाई को नौकरी और मुआवजे का भले ही ’समुदाय-विशेष बतंगड़’ बनाया जा रहा हो, पर हमें इसे नैतिक कदम मानना होगा। आरोप लगने के बाद राजा का इस्तीफा, मुख्यमंत्री समेत प्रदेश सरकार का सीबीआई जांच पर गंभीर रुख विश्वास जगाता है कि जल्द ही दोषी सामने आयेगा। मुआवजे की रकम और नौकरी, एक ईमानदार, कर्मठ आॅफीसर की कीमत तो नहीं चुका सकती पर इस शहादत के बदले सरकार को पीडि़त परिवार को न्याय ज़रूर दिलवाना होेगा। हवा में तीर मारकर हम असली गुनाहगार से कहीं छिटक न जाएं, यह बात ध्यान में रखनी होगी। सीबीआई से भी जनता यही उम्मीद कर रही है कि डिप्टी सीएमओ सचान और आरुषि हत्याकाण्ड की तरह वह यहां विफल साबित न हो !

Saturday, 9 March 2013



’पूसी कैट’ अशुभ कैसे हो गई ...?


जब तुम नासमझ थे, तब हमसे खेलते थे, आज जब समझदार हो तो हमारी फीलिंग्स से खेल रहे हो। है। अषुभ हम नहीं, तुम्हारे ख्याल हैं, जो हम बेज़ुबानों की ’म्याउं-म्याउं’ को आधुनिकता और ’समझदारी’ के साइरन से कंपेयर कर रहे हैं।



मेरा धीरे से ’म्याउं’ करना ही मेरी कमज़ोरी थी,  दरवाज़े के पीछे छिपकर तुम्हारी जि़ंदगी में मुझे झांकना ही नहीं चाहिए था। दरअसल मुझे तो तुमसे शिकायत करनी चाहिए कि बचपन में अंग्रेजी की किताब लेकर तुम क्यूं पूरे घर में ’पूसी कैट-पूसी कैट’ सुनाया करते थे ? जब तुम रोना बंद नहीं करते थे, तो मां भी तुम्हें यह कहकर डरा देती थी कि ’’चुप करो नहीं तो म्याउं आ जायेगी’’। देखो न ! मैं आज भी वैसी ही हूं, तुम्हारी छत पर से झांकती हूं, जब तुम निकलते हो तो तुम्हें अपना एहसास कराती हूं, पर जैसे ही मैं किसी गली या सड़क पर तुम्हारा बचपन याद दिलाने निकलती हूं तो तुम मुझे अशुभ मानकर वापस लौट जाते हो।
तुम्हारी मां जो लोरी में मुझे म्याउं कहकर दुलारती थी, उससे मिलने जब मैं किचेन में जाती हूं, तो मेरे पीछे डंडा लेकर दौड़ पड़ती है। उन दिनों ’’पूसी-कैट-पूसी कैट’’ जैसे ही तुम ज़ोर-ज़ोर से पढ़ते थे, मैं तुरंत तुम्हें सुनने तुम्हारे आंगन दौड़ पड़ती थी, तब तुम्हारी छत पर जाल नहीं था, मैं गुपचुप सीढि़यों से नीचे आ जाती थी। जैसे ही तुम मुझे देख लेते थे, किलकारियां मारकर हंस देते थे, क्या तब मैं तुम्हारे लिए ’शुभ’ थी ..? तब तो तुम मेरे रास्ता काटने पर कभी वापस नहीं लौटे। जैसे-जैसे तुम समझदार होते गए, तुमने अपनी प्यारी पूसी को अशुभ मान लिया। अब तुम्हें हम बिल्लियां, अशुभ-अपशकुन का आइना नज़र आतीं हैं।
याद है उस दिन जब तुमने मेरे लिए एक कटोरी में दूध रखा था, और दूर से मेरे आने का इंतज़ार कर रहे थे। मैंने अपने घर में तुम्हारे बारे में खूब बातें की थीं, उस एक कटोरी दूध से भले ही मेरा पेट न भरा हो, पर मेरा मन ज़रूर भर गया था। उस दिन मैंने तुम्हें और मां को मन ही मन ढेर सारा ’थैंक्यू’ बोला था। आज कई सालों बाद जब तुम एक बड़े अफसर बन गए हो, तुम्हें मेरा ख्याल ही नहीं आता। कल तुम नहीं थे, तो मैं छत पर तुम्हें आवाज़ लगाने आई थी, मेरी ’म्याउं-म्याउं’ सुनकर मां ने तुम्हारे भाई को डंडा लेकर मुझे भगाने भेजा। उन्हेांने बुदबुदाया कि ’बिल्ली का रोना अशुभ होता है, भगाओ इसे ’’! क्या हम बेज़ुबान भी शुभ-अशुभ हो सकते हैं ..?
शायद हमें बनाने के बाद उपर वाले ने गलती से तुम इंसानों के बीच भेज दिया है। वे इंसान जो बचपन में मुझसे खूब खेलना चाहते हैं, मेरी म्याउं सुनकर हंसना चाहते हैं, और जैसे-जैसे वे और उनकी अक्ल बड़ी होती है, हम उनके लिए अशुभ ओर अपशकुन बन जाते हैं। ऐसे ही मेरी एक सहेली पर पिछले दिन एक अंकल ने कार चढ़ा दी। उन्होंने पलटकर भी उसे नहंी देखा, और तड़पता छोड़कर धूल उड़ाते हुए निकल लिए। दरअसल वह कभी उनकी पालतू बिल्ली हुआ करती थी, एक दिन खेल-खेल में उसने उनके टी-मग में मूंह मार दिया तो उन्हेांने उसे पीटकर घर से बाहर कर दिया। जब भी वे गाड़ी लेकर आॅफिस को निकलते थे, तो वह उन्हें सीआॅफ करने जाया करती थी। उस दिन भी वह उन्हें शायद यही करने गई थी, पर अपनी नन्हीं सी जान को उनके प्यार पर कुर्बान कर आई।
माना कि हमें दूध पीना पसंद है, माना कि हम दिखने में भद्दे हैं, हमारी म्याउं-म्याउं इस दुनिया में अपशकुन की पहचान बन चुकी है, पर हमारी नन्हीं जान ने आज तक तुम लोगों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। जब-जब तुम्हारा बेटा रोया तो उसके हांेठों पर अपनी धीमी सी ’म्याउं’ से मुस्कान ला दी।  पूसी-कैट जैसी कविताएं सुनकर हम खूब खुश हुए, पर जैसे-जैसे तुम ब़ड़े होते गए, तुमने हमें अपनी जि़ंदगी से बाहर ही नहीं किया, हमारी बेइज्जति भी की। जो रास्ते तुम्हारे लिए हैं, वे ही हमारे लिए भी हैं, जिन गलियों में तुम खेल-कूद कर बड़े हुए, वहां हमें भी घूमने का अधिकार है, तुम कौन होते हो हमें अशुभ कहने वाले। अपशकुन हमारे रास्ता काटने से नहीं, तुम्हारा नज़रिया बदलने से होता है। अशुभ हम नहीं तुम्हारे ख्याल हैं, जो हम बेज़ुबानों की ’म्याउं’ को आधुनिकता और ’समझदारी’ के साइरन से कंपेयर कर रहे हैं।
--                     -तुम्हारी अपनी ’पूसी’।



Saturday, 16 February 2013


वैलेंटाइन पर विलेन बन गईं सहेलियां 

क्या दिलों ने भी टूटने के लिए यही दिन चुना था ..? निषी की फ्रेंड रोषनी खुषी से झूम उठी थी और बाकी सहेलियां षाॅक्ड रह गईं थीं। दरअसल निषी ने अपनी सभी सहेलियों से षर्त लगा रखी थी, कि इस वैलेंटाइन को रोहित आॅफीषियली उसका हो ही जायेगा पर ...


वैलेंटाइंस डे निकल गया ...? गुलाब के गोदाम खाली हो गए ..? गिफ्टस के शोरूम्स में पिछले कई महीनों से रखे गुड्डे-गुडि़ए भी आफ्टरआॅल बिक ही गए। बजरंग दल और शिवसेना जैसे मोहब्बत के विलेन से बचकर देश भर में खूब इश्क लड़ाया गया। आइए इस बीते हुए ’इज़हार दिवस’ पर दो गानों को प्यार के परिंदों पर फिट बेठाने की कोशिश करते हैं। ’अपनी तो जैसे-तैसे कट जायेगी ..आप का क्या होगा ...?’’ दूसरा थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए ’’... ! 
जिन लड़कों को हसीन हसीनाओं ने रिजेक्ट करते हुए ’नाॅट नाउ’ कहा, वे तो मन में ठान बैठे कि ’’चलो अपनी तो जैसे तैसे कट जायेगी .... आपका क्या होगा ...? लेकिन जिन मैडम्स ने ब्यूटी सलून जाकर अच्छे से फिगर-फेशियल करवाया था .. और उन्हें किसी खास ’मिस्टर राइट’ से उम्मीद थी, कि वो उनके कदमों में झुककर उनके काॅस्मेटिक चेहरे का चांद से कंपेरिज़न करेगा, अपने हाथों से वादों का गुलाब और इरादों का गिफ्ट देगा, वो तो उनकी सहेली को प्रपोज़ कर गया, और साहिबां देखतीं रह गईं। ऐसी ही एक ’हेट स्टोरी’ जिसमें सहेली बन गई विलेन।
निशिका की इसी साल काॅलेज में एंट्री हुई थी। मैनेजमेंट में बैचलर कर रही निशी, सैकंड सैमेस्टर में ही अपने क्लासमेट रोहित को दिल दे बैठी। रोहित अभी भी खुद को निशी का ’आॅन्ली फ्रेंड’ ही कंसीडर कर रहा था। काॅलेज-कैंटीन में उनकी गपशप घंटों चलती थी, काॅरीडोर में हाथों में हाथ डाले रोहित-निशी, ’लव वर्ड्स’ का टाइटल बन चुके थे। निशी ने अपनी सभी सहेलियों से शर्त लगा रखी थी, कि इस वैलेंटाइन को रोहित आॅफीशियली उसका हो ही जायेगा। जैसे-जैसे ’इश्क डे’ करीब आ रहा था। निशी का दिल धड़कते-धड़कते जैसे बाहर ही आता जा रहा था। 
14 फरवरी आई, रोहित को लेकर निशी से ज्यादा उसकी सहेलियां ऐक्साइटिड थीं। आखिर हों भी क्यूं ना ...?उसका स्टाइल, उसकी स्माइल, गुच्ची-लिवाइस के टैग्स, फास्ट्रैक की एक्सेसरीज़ .... इन ब्राण्ड्स की पहचान ही मानो रोहित से थी और रोहित की आइडेंटिटी बन चुके थे ये ब्राण्ड्स । अचानक बाइक से दनदनाते हुए साहबज़ादे एंट्री किए, दांतों में लंबी डंडी वाला गुलाब था, चेहरे पर स्माइल, और बाकी बाॅडी तो बस ब्राण्ड्स से फुलफिल्ड थी। बाइक के डिस्क ब्रेक्स लगे, निशी का दिल थमा, इधर रोहित टर्न हुआ, वहां निशी ने क्यूट स्माइल दी। एक पाॅकेट से रोहित ने कुछ कागज़ जैसा निकाला, वहीं निशी ने रोहित के लिए खरीदी राडो की घड़ी बाॅक्स से निकाल ली। ......... पर अचानक फीलिंग्स की सुनामी ...... दोनों दिलों में ज़ोरों की हलचल ......! 
ये क्या ....? निशी ज़रा आगे बढ़ती है, रोहित थोड़ा साइड से कदमों को लेफ्ट की ओर खींचता है .....’’हाइ रोशनी ...! एक्च्युअली मुझे तुमसे काॅलेज के फस्र्ट डे से कुछ कहना था ....पर आज हिम्मत जुटा पाया हूं ... देखो ना ....? मैं और निशी कितने अच्छे दोस्त हैं, पर प्यार .. प्यार तो मुझे सिर्फ तुमसे ही था। मेरे सपनों में तुम्हारी मुस्कान, ख्वाबों में तुम्हारी ही बातें रहतीं हैं .... ’विल यू बी माइ वेलेंटाइन ......? निशी का चेहरा लाल .... मेकअप गायब ....राडो की घड़ी पर आंसुआंे की बूंदें, ना चाहते हुए भी बड़ी मुश्किल से उसके चेहरे पर हल्की मुस्कराहट जि़ंदा  है ...! क्या दिलों ने भी टूटने के लिए यही दिन चुना था ..? निशी की दोस्त रोशनी खुश और बाकी सहेलियां शाॅक्ड हैं। रोशनी ’आई लव यू टू माइ हैंडसम’ बोलकर प्रपोज़ल एक्सेप्ट करती है, और रोहित को हग करती है। 
आंसुओं को दिल की तरफ भेजकर निशी रोशनी को काॅग्रैट्ज़ करती है, और वापस लौट जाती है। दरअसल इस वैलेंटाइंस डे पर जिन लड़कियों को उनके ड्रीमब्वाॅय से उम्मीद और ’ओवरएक्सपैक्टेशन थी, उन्हें हल्की निराशा झेलनी पड़ी। ब्वाॅयफ्रेंड्स के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ारना रिलेसनशिप में हल्का बोरिंग साबित हुआ । ऐसे मौकों का फायदा सहेलियों ने जमकर उठाया। 
इस माॅडर्न ज़माने में भी तमाम प्रेमियों की ’हेट स्टोरी’ निशी-रोशनी-रोहित से मिलती-जुलती रही। ऐसे में लड़कियों को कुछ की प्वाइंट्स ध्यान में रखने होंगे। नंबर एक तो यही कि अपनी सहेलियों से ज़रूरत से ज्यादा ’शेयरिंग’ रिश्ते के लिए इंज्यूरियस हो सकती है। हां एक बात और जिन गाॅर्जियस गल्र्स को उनके मि. राइट ने ठुकराकर साइड वाली मैम साहब को वैलेंटाइन बना लिया, वे अब सफाई में सिर्फ इतना ही कह पा रहीं हैं ’’ऐक्च्युअली मुझे प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ना ही नहीं था। वैसे भी अगले महीने बोर्ड एग्ज़ाम्स जो हैं। 
अब निशी और उस जैसी बाकी लववर्ड्स को इतना कहना तो बनता ही है ....’’थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए .......! ड्यूरिंग लव-शव, सहेलियों से दूरी बना लीजिए ...!
-मयंक दीक्षित,  
कानपुर। 

Monday, 21 January 2013


स्कूल तो गए .. फिर सीखे क्यूं नहीं .. ?


ऐसा नहीं है कि प्राइवेट एजूकेषन से स्टूडेंट्स का फ्यूचर अंधेरे में जा रहा है, पर सरकारी स्कूलों में केयरलेस मैनेजमेंट, मोटी तनख्वाह पर अंगड़ाइयां लेते अध्यापकों ने ऐसी नौबत ला दी है। ए.स.ई.आर. की सर्वे रिपोर्ट में बच्चे स्कूल तो उत्साह से गए हैं, पर उनके सीखने का स्तर निराष करता है ... 


स्लेट-खडि़या से उगाया हुआ शिक्षा का पौधा, वक्त की पटरी पर रगड़ता हुआ, आज डिजिटल डायरी और ई-क्लासरूम्स तक जा पहुंचा है। आज से दो दशक पहले की तसवीरों में ना तो निजी स्कूलों के चमचमाते भवन थे, और ना ही हर गली-नुक्कड़ पर आमंत्रण देते कोचिंग सेंटर। दादा-काका पहाड़े और मुहावरे याद कर सरकारी नौकरियां पा जाया करते थे। 
आधुनिकता की कसौटी पर हर क्षेत्र ने नए-नए आयाम स्थापित किए। एजूकेशन को मिशन के साथ-साथ ब्राइट कॅरिअर सेक्टर के रूप में देखा जाने लगा। नौनिहालों की बेसिक शिक्षा अब उनके माता-पिताओं की सैलरी और लाइफस्टाइल पर निर्भर हो चुकी है। 1991 मंे मुंबई के स्लम्स में गरीब बच्चों के सपने सच करने उतरा गैर सरकारी संगठन ’प्रथम’ वाकई काबिल-ए-तारीफ है। निदेशक रहते हुए माधव चवन ने इसके योगदान की खुश्बू भारत के 21 राज्यों तक फैलाई है। 
प्रथम ने 2011-2012 की रिपोर्ट में बेसिक शिक्षा की बिगड़ती हालत का जि़म्मेदार ना सिर्फ भारत सरकार की शिक्षा सम्बंधी नीतियों को बताया है, बल्कि यहां के शिक्षकों की कड़वी हकीकत सामने ला दी है। 567 कसबों में हुए सर्वे में एकमात्र अच्छी खबर ये है कि 2009 से 2012 में 6-14 एजग्रुप के 96.05 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल तक अपने कदम बढ़ाये हैं। ज़ाहिर है इसमें मिड्डेमील जैसे लुभावने कारणों का भी अहम योगदान रहा होगा। सरकार के राइट टू एजूकेशन की पीठ बेशक इसलिए थपथपाई जा सकती है, कि उसके तमाम प्रयास-पाॅलिसी के सहारे बच्चों की बड़ी संख्या ने स्कूलों का रूख किया है।
कक्षा पांच के 47 फीसदी बच्चे ही क्लास सैकंड की किताबें पढ़, समझ और हल कर पा रहे हैं। 2010 में जहां दस में से सात बच्चे जोड़ घटाने को फुर्ती से हल कर ले रहे थे, वहीं यह ग्राफ भी गिरकर दस में से पांच हो गया है। गांव-देहात और छोटे कसबे के मां-बाप अपने बच्चों का ब्राइट फ्यूचर निजी स्कूलों में तलाश रहे हैं। 6-14 एजग्रुप का प्राइवेट एजूकेशन में योगदान 2006-12 के बीच दस प्रतिशत बढ़कर 18.07 से 28.03 हो चुका है। इस बीच ट्यूशन की आवोहवा ने भी कसबों-देहात में दस्तक दी है।
ऐसा नहीं है कि प्राइवेट एजूकेशन से स्टूडेंट्स का फ्यूचर अंधेरे में जा रहा है, पर सरकारी स्कूलों में केयरलेस मैनेजमेंट, मोटी तनख्वाह पर अंगड़ाइयां लेते अध्यापकों ने ऐसी नौबत ला दी है। व्यवहारिक उदाहरण में हम-आप के ही घरों में लोग बात करते दिख जाते हैं, ’’उन साहब की नौकरी बढि़या है, दस बजे गए, दो बजे आ गए, आराम से धूप सेंकी और चले आये’’। शिक्षकों की भर्ती परीक्षाएं भी घपले-घोटालों की भेंट चढ़ जातीं हैं, जैसा कि यूपी में टी.ई.टी. के साथ हुआ। प्राइवेट ट्यूशंस से स्टूडेंट्स का भला तो हो रहा है, पर सिर्फ उन्हीं का जिनके पेरेंट्स सक्षम हैं। सरकारी-प्राइवेट स्कूलों वाले तमाम मास्साब भी सिंसियर होकर सिर्फ कोचिंग सेंटर में ही पढ़ाते हैं।
भारत-चीन से सामना करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने नौनिहालों को गणित में कमज़ोर पाये जाने पर चेतावनी दी थी। उनसे कहीं ज्यादा चिंता हमारे देश के हुक्मरानों को होनी चाहिए। 2010 में पांचवी क्लास के 29.01 फीसदी बच्चे बिना किसी की मदद से दो अंकों का जोड़-घटाना नहीं कर पाये थे, 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 39 प्रतिशत हुआ और 2012 की रिपोर्ट में चैंका देने वाल 46.05 प्रतिशत जा पहुंचा है।
शिक्षा के सतर को सुधारने के लिए सिर्फ कागजी नीतियां और पैसा फेंकना ही सरकार के लिए काफी नहीं है, उसे शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की मदद से ग्रासरूट मंथन करना होगा। हमारे देश के अध्यात्मिक गुरूओं के श्रीमुख जब नक्सलियों की सीढ़ी सरकारी स्कूल के बच्चों को बताते हैं, तो दर्द और धिक्कार महसूस होता है। बच्चे ही किसी देश के भविष्य का आइना समझे जाते हैं, यदि हम उन्हें ही शिक्षित और समझदार बनाने में आनाकानी करेंगे, तो कल्पना काफी भयावह हो सकती है। 
-मयंक दीक्षित
                                      स्वतंत्र पत्रकार, कानपुर।