Saturday, 25 May 2013


जज़्बातों को फिल्मी न होने दें !


आशिक और आशिकी के बीच दुनिया ने एक ऐसी दीवार बना रखी है, जिस पर लिख दिया गया है कि आप या तो मुहब्बत ही कर पाएंगे या फिर जि़ंदगी में सफल ही हो पाएंगे ! इश्क की शुरुआत जज़्बातों से होकर जि़द तक जा पहुंचती है, पर जब तक इज़हार का अंदाज़ फिल्मी और दिखावटी रहेगा, आप हसीन लम्हों को यादगार बनाने से चूकते रहेंगे। 

कितना मुश्किल है इश्क हो जाने के बाद उसे छिपाये रखना ..! ठीक उसी तरह, जैसे आपने किसी के साथ सीरियस-मज़ाक किया हो और फिर आप खुद को बेकसूर साबित करने के लिए उसे समझाए जा रहे हैं! यहां समझाने वाले आप खुद हैं, और समझने वाला दिल ! अक्सर दिल और दिमाग, ’लेफ्ट-राइट’ गेम खेलते रहते हैं ! दिमाग में फयूचर हाॅरर और दिल में प्रिज़ेंट प्लेज़र। दिमाग में टैंशन का टशन और दिल में दिलेरी के दिलासे ! ये  दिमाग उस बांध की तरह है, जो एक हद तक लहरें रोकने की ताकत रखता है। पर दिल की तूफानी लहरें, जब होश-ओ-हवास खोकर दौड़ीं चली आती हैं, फिर दिमाग का बांध टूट जाता है। दिल खुद को जीता हुआ और दिमाग कुछ दिनों के लिए हारा हुआ सा महसूस करने लगता है। 
हालिया फिल्म आशिकी 2 का डाॅयलाॅग - ’’मुहब्ब्त, प्यार, इश्क लफजों के सिवाय और कुछ नहीं, बस किसी स्पेशल के मिल जाने के बाद इन शब्दों को मायने मिल जाते हैं।’’  फिल्मों से लेकर फरिश्तों की कहानियों तक में इश्क और इज़हार के बीच गहरा रिश्ता रहा है। इस आधुनिक जि़ंदगी में इज़हार को हम ’प्रपोज़’ कहने लगे हैं। दिल के लिए ’प्रपोज़’ शब्द एक ’मीडिया’ है। ऐसा मीडिया जो ब्रेक लेकर दिल के प्रोग्राम सामने वाले को सामने जाकर पेश कर देता है। प्रपोज़ करने के बाद का ’डिसीज़न’ टीआरपी रेटिंग की तरह है। यदि आपका प्रोग्राम अच्छा रहा, तो हाइ-टीआरपी, वरना ’नाॅट नाउ’ का ज़बर्दस्त फ्लाॅप शो। क्यूं न प्यार को इज़हार की शक्ल कुछ इस तरह दी जाए कि वह ना सिर्फ यादगार रहे, साथ ही आपकी लव लाइफ में अभी तक के शानदार लम्हों में शामिल हो जाए ! ठीक वैसा ही जैसा रितिक-सोनिया ने किया। 
काॅलेज में रितिक का सपना सिर्फ किताबें और कॅरिअर था। उसकी आंखों में गर्लफ्रेंड या लवर सर्च करने की ना तो ख्वाहिश थी और न ही इंट्रेस्ट। अपनी स्टडी को ही उसने फ्रेंड और सक्सेज़ को ही अपनी गर्लफ्रेंड बनाने का फैंसला किया था। अक्सर उसकी बातें लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट ला दिया करतीं थीं। हंसमुख नेचर होना वाकई शानदार साबित होता है। आप रूठों को चुटकियों में मना सकते हैं, अजनबियों को अपना बना सकते हैं। दरअसल दुनिया में कुछ मिथ बन गए हैं, जिनमें से एक यह कि, लव-लाइफ, स्टडी को स्पाॅयल कर देती है। रितिक अक्सर दोस्तों को इस टाॅपिक पर ऐक्सप्लेनेशन देना शुरु कर देता था। मानो वह लवलाइफ से नहंी, अपने विचारों और एटीट्यूड से बहस कर रहा है। रितिक सैकंड ईयर स्टूडेंट था, और जल्द ही माॅस कम्युनिकेशन कोर्स की उड़ान उसे थर्ड ईयर की ’मीडिया-मिस्ट्री’ में भेजने वाली थी। उसके पास ब्राण्डेड ऐक्ससरीज़, बाइक, बाइसेप्स जैसे इंप्रेसिव फीचर्स नहंी थे। दूसरों को हंसाने-गुदगुदाने की चाहत ही उसकी लाइफ का अभी तक का अचीवमेंट था। कुछ दिनों बाद उसके फ्रंेड-सर्कल में सोनिया एंट्री करती है। बात और जज़्बात कब जि़द बन जाएं, कहना मुश्किल है। दोस्ती से होकर अपनेपन की यह सुरंग, इश्क के दरवाज़े तक ले जाएगी, रितिक ने सोचा भी न था। 
इज़हार का सफर अभी दूर था। रितिक और सोनिया दोनों के फोन नंबर्स ऐक्सचेंज हुए। ’गुड-माॅर्निग’, ’गुडनाइट’, ’टेक केयर’ जैसे शब्दों में वाकई जादू सा होता है। यदि नियम से कोई आपकी फिक्र करे, तो आपका दिल ज़ोरों से धड़कना शुरु कर देता है और दिमाग ज़ोरों से डांटना। ठीक ऐसा ही रितिक के साथ हो रहा था। खाली समय में वह खुद को सोनिया का ’सिर्फ दोस्त’ कहते हुए दिलासे देता रहता, और जैसे ही फोन में मैसेज या काॅल टयून बजती, झट से ओके कर आंखें गढ़ा देता। दो महीने, दिल और दिलासों का खेल चलता रहा। रितिक-सोनिया मिलते रहे, बात ’गुड माॅर्निंग’ में लिपटी हुई, अब ’लंच कर लेना’, ’डिनर कर लेना’ जैसे मैसेजों तक जा पहुंची थी। कितना बेहतरीन मौका होता है न, जब कोई आपसे रोज़ ऐसी बातें कहे, जिसे सुनकर, खुद को कंट्राॅल करने की कोशिशें करनी पड़ें। 
फाइनली, रितिक को रियालाइज़ हुआ कि सोनिया और वह, इश्क के दो मोती हैं, जो जल्द ही एक माला में बंधना चाहते हैं। लाइफ और लव लाइफ में ज़रा सा अंतर है। यहां सिर्फ हाइ-हलो, बाइ-गुडबाइ नहंी, जि़म्मेदारी और प्यार की भी भरपूर ज़रूरत है। फिलहाल रितिक ने सोनिया को अपने दिल की बात कहने का डिसीज़न लिया। हालांकि यह सब उसने तभी सोचा जब उसे विश्वास हो चुका था कि सोनिया भी उससे उतना ही प्यार करती है। 
अगले दिन काॅलेज पार्टी में दोनों मिले, कुछ बातें हुईं, और फिर एक ऐसा मौका, जिसे हम यूथ ’प्रपोज़ल’ कहते हैं पर रितिक-सोनिया के लिए यह एक बेहद हसीन पल था। प्रपोज़ करते हुए एक गलती कभी नहीं करनी चाहिए जो रोहित ने नहीं की। यादगार प्रपोज़ल में फिल्मी-नकल करना थोड़ा ड्रामेटिक फील करवा सकता है। इश्क बयां करना एक ऐसा पल साबित होता है, जिसकी याद मुश्किल से ही कभी धुंधली पड़ती है। ऐसे में यदि आप ज़रा भी ओवर-क्रिएटिव या फिल्मी अंदाज़ निभाने में रहे, तो बात बिगड़े भले ही न, पर खूबसूरती और सादगी गायब हो जाने का डर रहता है। रितिक ने सोनिया का हाथ थामा, और बड़ी शिददत से पुरानी बातों के सूटकेस में दिल की नई बात शानदार जज्बातों की पैकिंग के साथ रखकर उसे गिफट कर दीं। सोनिया ने भी स्माइल करते हुए, उसे ’आइ लव यू टू’ कह दिया! प्रपोज़ल सिंपल पर शानदार था। दिल की बातें सीधे कहना भी मुश्किल है, और घुमाकर कहना भी एक कला। सादगी और अपनेपन का ऐसा काॅकटेल आपकी  जि़ंदगी को खुशियों से भर सकता है। आज रितिक और सोनिया दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते हैं। वे हैरान और परेशान होकर ठहाके भी लगाते हैं कि इश्क कितना चालांक और खुशनसीब है कि उसने अनऐक्सपेक्टिड को भी ऐक्सपेक्टिड कर दिखाया। 
ये तो हुई रितिक-सोनिया लव स्टोरी, अब बारी प्रपोज़ल और उसकी इंपाॅर्टेंस की। दरअसल फिल्में असल जि़ंदगियों से ही बनाईं जाती हैं। क्यूं न दिखावटीपन और नकल को एक तरफ रख, रिलेशनसिप को सादगी और खूबसूरती से एंज्वाॅय किया जाए ! मशहूर लेखक शिव खेड़ा ने एक बार कहा था- ’’जीतने वाले कोई अलग काम नहंी करते, वे हर काम अलग ढंग से करते हैं।’’ याद रखिए प्यार जि़ंदगी भले ही न हो, पर जि़ंदगी का ऐसा हिस्सा है, जिसे इग्नोर नहंी किया जा सकता। हिफाज़त और अपनेपन की मीठी बोलियां, जब दुनियादारी की इस भागमभाग में दिल को सुनाई देतीं हैं, तो वह सबकुछ छोड़कर उन्हें  हमेशा के लिए पाने की कोशिश में लग जाता है। दो बेहद ज़रूरी बातें, फयूचर स्ट्रगल यानि स्टडी और लव लाइफ में बैलेंस। सक्सेज़, लव लाइफ में ही नहीं आपकी लाइफ में भी होनी चाहिए। क्यूं न आज दो मिथों को तोड़कर बदल दिया जाए ? एक, कि लाइफ-लवलाइफ को बैलेंस रख कर, बिना किसी प्राॅब्लम के सक्सेज़ के रास्ते तलाशे जा सकते हैं और दूसरा, लव प्रपोज़ल को फिल्मी नकल के धागे से न बांधकर, अपने अंदाज़ में अपनाया जाए।
 जो आप हैं, वह आप ही कर सकते हैं, और जो आप नहंी हैं, बेहतर है उसे करने की कोशिश तो दूर, उस बारे में सोचें भी नहीं। फिलहाल इश्क और प्रपोज़ल का यह लेख खत्म हो रहा है, पर आखिरी शब्दों में एक चेतावनी ज़रूर कि लाइफ और लव को साथ लेकर चलने में बुराई नहंी है, बस डर बना रहता है कि आप अपनी मंजिल से भटकें नहंी, बाकी सुख हो या दुख, आपके साथ कोई है, जो हर वक्त, हर लम्हा, पलकें बिछाए आपके सपनों को अपने सपने बनाने के लिए बेताब है। आफटरआॅल लाइफ इज़ टू एंज्वाॅय, नाॅट टू स्पाॅयल ... डियर ! 



Monday, 20 May 2013


आईपीऐल के दलदल में क्रिकेट का कमल


आईपीऐल में स्पॉट फिक्सिंग-फसाद से ज्यादा हैरानी इस बात की है कि श्रीसंत जैसा काबिल खिलाड़ी भी इस दलदल में खुद को साफ-सुथरा नहीं रख पाया। आईपीएल के ढांचे में जल्द बदलाव करने की ज़रूरत है, कहीं ऐसा न हो कि क्रिकेट के नाम पर हम घंटों उस खेल को टकटकी बांधकर देखते रहें, जिसकी जीत-हार पहले से ही तय थी!

आईपीएल पर फिक्सिंग के छींटे ! एक नामी न्यूज़ चैनल का फलैश। देखकर ज़रा भी हैरानी नहीं हुई, पर फलैश की दूसरी लाइन ’श्रींसंत समेत तीन खिलाड़ी गिरफ्तार, जांच जारी!’ पर नज़र पड़ते ही अगला चैनल ट्यून करने को बेताब उंगलियां ठहर गईं। क्रिकेट का डाइ-हार्ट फेन न होते हुए भी इस खबर को घंटों चैनल बदल-बदल कर जानने-समझने-परखने की कोशिश करता रहा। तथ्य, तस्वीरें और तफतीश की उधेड़बुन जारी थी। कहीं क्रिकेट ऐक्सपर्ट गर्मजोशी से अपना बयान दर्ज करवा रहे थे, तो शिल्पा शेट्टी अपनी टीम राजस्थान राॅयल्स की सफाई, बेहद सफाई से दे रहीं थीं। दरअसल आईपीएल के पिछले कुछ मैचों में श्रीसंत, अजित चंडीला और अंकित चव्हाण पर स्पॉट फिक्सिंग के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
आईपीऐल को क्रिकेट मैच का आयोजन कहते हुए अक्सर झिझक महसूस हुआ करती थी, पर अब तो धिक्कार सा होने लगा है। खुल्लम-खुल्ला सट्टेबाजी, शोहरत की बेशुमार ’बैटिंग’, ने खेल की शराफत का गला घोंट दिया है। आईपीऐल में सिर्फ फिक्सिंग का छिटपुट मामला होता, तो शायद मैं इस पर लिखने की न सोचता, पर श्रीसंत जैसे हुनरमंद और काबिल खिलाड़ी पर लगे आरोप ने वाकई देश के सक्रिय नागरिकों को झकझोर दिया है। वक्त इस बहस में पड़ने का नहीं है कि फिक्सिंग कैसे हुई, और कौन मुख्य किरदार में है ? ज़ोर देने की ज़रूरत इस बात पर है कि किन कदमों को उठाकर हम आईपीएल जैसे मनोरंजक और शोहरत-विशेष आयोजनों में शराफत और सच्ची खेल-भावना बरकरार रख सकते हैं ?
तेज़ दिमाग के मध्यम-तेज़ गेंदबाज़ ऐस. श्रीसंत का नाम भारतीय टीम के होनहार और उम्दा गेंदबाज़ों में लिया जाता है। कुछेक अपवादों को नज़रंदाज़ कर दें तो साफ-सुथरी छवि उनकी पहचान रही है। आईपीएल फाॅर्मेट में टीमें बनाई तो जातीं हैं, पर ज़मीनी तौर पर बैटिंग टीम के मालिकान और उनके ’इरादे’ ही करते हैं। जैसे ही ये ’इरादे’ डगमगाते हैं, खेल का ’खेल’ बिगड़ने लगता है और फिक्सिंग के फसाने पैदा होने लगते हैं। अब बात टीम से शुरु हुई है, तो एक नज़र 2008 की पहली आईपीएल विजेता टीम राजस्थान राॅयल्स के रिपोर्ट कार्ड पर। प्वाइंट टेबल में मुंबई और राजस्थान के बीच दूसरे स्थान के लिए कश्मकश जारी थी। दोनों टीमें प्लेआॅफ में जगह पक्की कर चुकीं थी। ज़ाहिर तौर पर लक्ष्य पहले स्थान पर पहुंचने का था। टीम के बूस्ट प्लेयर श्रीसंत समेत तीनों खिलाडि़यों पर आरोप है कि उन्होंने बुकी के इशारे पर नोबाॅल, डेडबाॅल डालकर खेल और उसके मायनों को चोट पहुंचाई।
खिलाडि़यों पर आईपीऐल-फिक्सिंग के छींटे जैसी बात से हैरान होना ठीक उसी तरह है जैसे कोई कमल तोड़कर लाए और आप उसके पैरों में कीचड़ न लगे होने की उम्मीद करें। श्रीसंत केरेला के पहले रणजी खिलाड़ी हैं, जिन्हें सीधे भारतीय टीम में 20-20 खेलने का मौका मिला। अपने शानदार कॅरिअर में उन्होंने 27 टैस्ट मैचों में 87 विकेट और 53 वन-डे मैचों में 75 विकेट झटके है। श्रीसंत केरल के अकेले ऐसे गेंदबाज रहे हैं, जिन्होंने रणजी ट्राॅफी में हैट्रिक ली है। 2008 में हरभजन सिंह के साथ उनके संबंधों में ज़रूर कुछ खटास रही, पर उन्होंने मामले को खेल के मायनों से ज्यादा तवज्जो नहीं दी। उनकी मध्यम-तेज़ गति गेंदबाज़ी ने मैदान में विपक्षी टीम के बल्लेबाज़ों को अक्सर हैरत में डाला है। जहां तक कप्तान धोनी से मतभेद की बातें उछली है, तो व्यवहारिक तौर पर कभी-कभार खिलाडि़यों और कप्तान के बीच मसलों पर सहमति-असहमति का मन-मुटाव रहता ही है। सच तो यह है कि आईपीऐल में जिस खिलाड़ी ने रुपए-पैसों की चिंता नहंी की, वह बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद भी घाटे में ही रहेगा। पर यहां घाटे से मतलब ऐसे साॅल्यूशन से कतई नहीं है जैसा श्रीसंत व बाकी दो खिलाडि़यों ने अपनाया।
यदि हमारा हिंदी शब्दकोश उदार होता, तो अब तक आईपीएल और विवाद शब्द पर्यायवाची बन चुके होते। 2008 से लेकर अभी तक एक भी आयोजन साफ-सुथरा और शांतिपूर्ण नहीं रहा। बीते साल 5 खिलाडि़यों पर फिक्सिंग के आरोप सही साबित हुए थे, पर तब भी बात बहस और बयानों के आए-गए विस्फोट की तरह रह गई। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने श्रीसंत को अपने दोस्त के यहां से और बाकी दो खिलाडि़यों को टीम के नरीमन हाउस होटल से हिरासत में लिया है। आरोपियों पर आईपीसी के 420 और 120 बी के तहत केस फाइल करने की तैयारी है। साथ ही सबूत जुटाने में जुटी दिल्ली पुलिस अब बुकी के तमाम आला नटवरों की तलाश में ताबड़तोड़ छापेमारी कर रही है। दोष का दरवाज़ा सिर्फ खिलाडि़यों तक ही नहंी खुलता, असली गुनाहगार तो बुकियों का देशभर में फैला ज़बर्दस्त नेटवर्क है, जो लालच और शोहरत की चकाचैंध से खेल और उसके सम्मान को अंधेरे में ले जा रहा है।
हमेशा की तरह दोषी खिलाडि़यों की आधिकारिक टीमों ने आरोपों से अपना दामन बचा लिया है। पुलिस जांच-पड़ताल कर दागी चेहरों को सामने लाने की भरपूर कोशिश में है। चर्चा है कि दोषी पाए जाने पर खिलाडि़यों पर आजीवन वैन लगेगा, व उन्हें सख्त सजा होगी, पर इससे भी ज्यादा ज़रूरी है कि मामले की जड़ तलाशी जाए। जब तक   कैंसर जैसे जानलेवा रोग को पेनकिलर या डिस्प्रिन जैसी दवाओं से खत्म करने की कोशिशें होतीं रहेंगी, रोग बढ़ता ही जाएगा। आज श्रीसंत, कल कोई और धीरे-धीरे हमारी पहचान, सम्मान और संस्कृति का खेल क्रिकेट, फिक्स-गेम की शक्ल ले लेगा। फिर जीतना-हारना ही सबकुछ होगा। देश और उसकी भावनाओं पर चोट कर जिन लालची और नोट के भूखों ने यह मोहजाल बिछाया है, उनकी हवेलियां बनेंगी, और संस्कार और उसूलों की इमारतें ढहतीं चलीं जाएंगी।
बहुत कम वक्त बचा है इस खेल को वापस उसकी पहचान और सम्मान दिलाने का। आईपीऐल की शुरुआत खिलाडि़यों के विकास और दर्शकों के मनोरंजन के लिए हुई थी, न कि खेल और खिलाडि़यों की अवैध सौदेबाज़ी-सट्टेबाजी के लिए। शोहरत और शराफत की इस जंग में क्रिकेट अब कराह रहा है। हर किसी को शक होने लगा है कि जिस्म दिखातीं चीयरलीडर्स के पीठ पीछे कैसे मैच मालिकान करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे करते हैं। आईपीऐल को आगे भी यदि जारी रखना है तो कायदे-कानून को कड़े करने होंगे। सिर्फ मनोरंजन का वास्ता देकर आप दर्शकों को धोखे में नहंी रख सकते। देश जानना चाहता है कि कौन, कैसे, और क्यूं खेल की भावनाओं को नोटों की गडिडयों के नीचे कुचलना चाहता है। फिलहाल मामले की जांच जारी है, नतीज़ा सामने आना बेहद ज़रूरी है। आईपीएल के ढांचे में जल्द ही बदलाव करने की ज़रूरत है, कहीं ऐसा न हो कि क्रिकेट के नाम पर हम घंटों उस खेल को टकटकी बांधकर देखते रहें, जिसकी जीत-हार पहले से ही तय थी।

         

Saturday, 11 May 2013


बेबस आंखों में ’शिकायत’ के आंसू ....


बारहसिंगा को उत्तर प्रदेश के राजकीय पशु होने का तमगा हासिल है, पर दिमाग पर बेहद ज़ोर डालने के बाद कोई भी ऐसी सरकारी योजना याद नहीं आती, जो इस प्रजाति के विकास और देख-रेख के लिए लाई गई हो। सफलता और ऊंचाइयों पर कब्जा करने के लिए हमने प्रकृति की शानदार साड़ी से जो मोती नोचे हैं, क्या वापस लगा पाएंगे ....?

एक बेहद सीधा और मासूम जीव, जो आज तक लोगों के दिलों पर राज करता रहा। जिसने हमेशा अपनी मासूम हरकतों से बच्चों-बड़ों, सभी के चेहरों पर मुस्कराहट दी। बड़ी सी काली आंखें, दर्जनभर सींगों से सजा सिर, सरपट दौड़ती-कूदती पतली टांगों वाला बारहसिंगा आज बेबस है। प्रकृति की बिछाई जंगलों की चादर तेज़ी से खत्म हो रही है। जल, ज़मीन और जि़ंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहे उत्तर प्रदेश के इस राजकीय पशु को न समाज कुछ दे पाया और न सियासत। प्रदेश की सरकारें चिडि़याघरों व उद्यानों पर बेशुमार खर्च तो करती रहीं, पर हमेशा की तरह सियासत, संवेदना पर हावी ही रही। आधुनिकता और औद्योगीकरण के भीड़ भरे मेले में तमाम जीव-जंतुओं समेत बारहसिंगा भी हम इंसानों से सुरक्षा और संवेदना की भीख मांग रहा है। देश का सबसे बड़ा और राजनीति की चैपाटी में सबसे अहम प्रदेश, उत्तर प्रदेश के इतिहास में बारहसिंगा राजकीय पशु नाम से दर्ज है, पर दिमाग पर बेहद ज़ोर डालने पर कोई भी ऐसी योजना याद नहंी आती, जो बारहसिंगा के विकास और देख-रेख के लिए लाई गई हो।
लंबी घासों में छिपने के शौकीन बारहसिंगों की संख्या तेजी से खत्म हो रहे जंगलों के साथ कम हो रही है। हिरणों की इस खूबसूरत प्रजाति के गायब होने में ग्लोबल वार्मिंग, अवैध शिकार व जलवायु में बदलाव जैसे कारण बेहद अहम हैं। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश की कुल प्रजातियों में 8.86 प्रतिशत प्रजातियां खत्म होने की कगार पर हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में खत्म हो चुके बारहसिंगे अब सिर्फ भारत के उत्तरी और मध्य क्षेत्रों पर निर्भर हैं। दक्षिण-पश्चिम में नेपाल में ज़रूर इनकी अच्छी-खासी संख्या है, पर किसी ज़माने में उत्तर प्रदेश की झाडि़यों में फुदकते बारहसिंगे अब सिर्फ तस्वीरें ही छोड़ गए हैं। 170-283 किलो वजनी, व लगभग 60 इंच लंबे इस मासूम जीव ने देखने वालों को तो अपने शानदार करतबों से खुश किया, पर खतरनाक जानवरों व शिकारियों की नज़रों में हमेशा खटकता रहा। रेशमी रूह और बेशकीमती सींगों ने बारहसिंगों को तस्करी के दलदल में ढकेल दिया। लालच और लोभ के आगे मासूमियत और सुंदरता की एक न चली और देखते-देखते एक चंचल-शांत जीव हमारे बीच से गायब सा होने लगा।
आमतौर पर नदियों के करीब रहने वाले इन जीवों की संख्या 1964 में 3000-4000 के बीच थी, जो बीते दशक में आधी से भी कम रह गई। असम के काजीरंगा नेशनल पार्क व मानव नेशनल पार्क में इस जीव पर गहरा शोध चला व इनकी देख-रेख पर खासा योजनाएं लाईं गईं। दरअसल बेहद डरपोंक और असहाय होना भी इस जीव के मारे जाने का बड़ा कारण रहा। खुद को बचाने में कमज़ोर इस प्रजाति को जो सरकारी व सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली और परिणाम आज हमारे सामने है। लंबी घास इन्हें सिर्फ भोजन ही नहीं, नन्हें शावकों के लिए सुरक्षा-कवच का भी काम करतीं थीं, जिन्हें हम इंसानों ने विकास के नाम पर ताबड़तोड़ उखाड़ना शुरु कर दिया। बारहसिंगों में यदि एक भी साथी मारा जाता है, तो वे बेहद असहज और सदमें में चले जाते हैं। कमज़ोर दिल होने से अक्सर हार्ट-अटैक के चलते उन्हें जान गंवानी पड़ती है। हालिया आंकड़ों में फिलहाल मध्य भारत में वन्य कर्मियों की चुस्त देखरेख से इनकी संख्या 600 हुई है, पर बाकी जगहों से गायब हो रहे बारहसिंगों को नजरंदाज़ करना निहायत बेइमानी होगी। कभी मध्य प्रदेश का राजकीय पशु रह चुका बारहसिंगा अब किताबों में उत्तर प्रदेश की शान के नाम से दर्ज तो है, पर सुविधाएं और सुरक्षा उससे कोसों दूर है।
उत्तर प्रदेश के कानपुर में बीते दिनों दर्जनों हिरण लापरवाही और ढुल-मुल प्रशासनिक रवैए की भेंट चढ़ गए। कार्रवाई के नाम पर जू निदेशक का तबादला हुआ और मामले की लीपापाती कर प्रदेश में लाॅयन सफारी व वन्य संपदा बचाने जैसी छिटपुट योजनाएं मंच से उछाल दी गईं। सियासत में संवेदना के इस सूखे ने हज़ारों प्रजातियों, को सरकारी वेतन पर ऐश कर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दिया है। योजनाएं कागजों पर फल-फूल रहीं हैं, और पर्यावरण के मोती कहे जाने वाले जीव-जंतु घुट-घुट कर मर रहे हैं। चिडि़याघरों ने शोकेस की शक्ल ले ली है और उनमें काम कर रहे कर्मचारी शोपीस साबित हो रहे हैं। संवेदनशील और जानकार वन्य विशेषज्ञों को तवज्जो न देना भी सरकार की एक खामी है, जो आगे चलकर समाज को सिर्फ पछतावा ही देगी।
सही तस्वीर में झांकें तो कहना गलत नहंी होगा कि बारहसिंगा की मासूम और खूबसूरत प्रजातियों के दुर्लभ दर्शन अब सिर्फ पांच राष्ट्रीय उद्यानों में किए जा सकते हैं। जिनमें उत्तर प्रदेश में सिर्फ दुधवा नेशनल पार्क, मध्य प्रदेश में कान्हा और इंद्रावती, असम में काजीरंगा और मानस प्रमुख हैं। लंबी घासों से झांकती बड़ी सी काली आंखें और झाडि़यों में तैरते लंबे सींगों की कहानी जितनी इमोशनल और फीलगुड लगती है, असलियत में उतनी ही दर्दनाक भी है। प्रकृति के इस नायाब तोहफे को तस्कर नोंच रहे हैं, कटते जंगल बेघर कर रहे हैं, और हम सिर्फ और सिर्फ तमाशा देख रहे हैं। योजनाएं आती रहेंगी, शोध चलते रहेंगे, संस्थाएं साल दर साल गिनतियां करती रहेंगी, पर क्या बारहसिंगों का झुंड हमारी आंखों के सामने हंसता-खेलता फुदकता दिखेगा ..? क्या ऐसा वक्त करीब है जब किताबों और पोस्टरों में ही बारह सींग वाले इस जानवर की तस्वीरें हम देख पाएंगे ..? क्या वाकई हम जंगलों के साथ-साथ इस मासूम और चंचल प्रजाति को देखने के लिए तरस जाएंगे ..? ऐसे ही सवालों के साथ मेरा यह लेख तो खत्म हो रहा है, पर विकास और ऊंचाइयों पर कब्जा करने के लिए हमने प्रकृति की खूबसूरत साड़ी से जो मोती नोचे हैं, क्या वापस लगा पाएंगे ....?



Saturday, 4 May 2013


महफि़ल, मायनों और मजबूरियों का 

चुंबन   

बदकिस्मती से बेचारा हो चुका है चुंबन। कामुकता के कीचड़ में चुंबन के होंठ कुछ ऐसे सने कि उनमें लिपिस्टिक की खुश्बू और कोमलता की कालीन खोजी जाने लगी। अफसोस कि यू-ट्यूब पर सर्च करने पर एक भी ऐसा चुंबन नहीं मिला, जो मां ने बेटे के माथे पर दिया हो, या एक भाई ने राखी बांधती अपनी बहन को !


हिन्दी में चुंबन, अंग्रेजी में किस। होंठों पे वफा की नमी और दिल में प्यार की हिलोरें ही चुंबन लेने और देने की इच्छा पैदा करती हैं। रील से रियल तक, फिल्मों से फेमिली तक चुंबन का तरीका, सलीका, सब बदल गया है। चूमने से दिल को ठंडक और अपनेपन का ऐहसास होता था, करीबी और दूरी के बीच का पुल था चुंबन। कुछ सालों से इस का आधुनिक आयात, पश्चिमी देशों से होने लगा। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था कि भारत में इसे सादगी और पवित्र प्रेम का हिस्सा माना जाता था। गांव के बुजुर्ग हमारे हाथ चूमते थे, रिश्तेदारों के स्वागत करने का अंदाज़ भी इसी से बयां होता था। बीते कुछ साल से ’चुंबन-विशेष अभिनेता’ पैदा होने लगे। किसिंग सीन की भयानक भरमार ने पाश्चात्य संस्कारों से रेस लगानी शुरु कर दी। कामुकता के कीचड़ में चुंबन के होंठ, ऐसे सने कि उनमें लिपिस्टिक की खुश्बू और कोमलता की कालीन खोजी जाने लगी। किसिंग के इस आयात का असर, संस्कारों और विचारों पर तो पड़ा ही है, साथ ही फूहड़ता और अश्लीलता की ऐसी इमारत खड़ी हो गई है, जिसने सालों पुराने आत्मीय चुंबनों को खुद में ही दफ़न कर लिया है। इसे इच्छाओं से अलग करना होगा, खासकर वे इच्छाएं जो सिर्फ शारीरिक संतुष्टि तक जाकर खुद-ब-खुद पूरी होने के खोखले दावे करतीं हैं।
दुनिया को वैश्विक गांव बनाने के दावे करने वाले इंटरनेट पर जब ’चुंबन’ शब्द के मायने खोजने की कोशिश की तो विकीपीडिया ने इसका इतिहास परोस दिया। लगभग 22 तरीके के चुंबन यहां बताए गए। होंठों से लेकर जीभ तक, चेहरे से लेकर तलबों तक और तमाम नुस्खों-नज़रियों को पिरोकर चुंबन की ंिचंताएं और सावधानियां भी लिखीं पड़ीं हैं। किसिंग-टिप्स की लंबी-चैढ़ी लिस्ट यहां सिर्फ इंटरनेट का मददगार होना साबित नहीं करती, यह भी ज़ाहिर करती है कि इंटरनेट यूज़र्स के दमदार रिस्पांस से ही चुंबन के इन नायाब नुस्खों को यहां सार्वजनिक किया गया है। तरीके और तस्वीरों ने इस शब्द के ढेरों मायने गढ़ दिए हैं, पर कामुकता की जकड़ से इसे छुड़ाने में इंटरनेट का पक्षी भी बुरी तरह हांफ गया है। काले बोल्ड अक्षरों में यह चेतावनी मेरी नज़रों से बच नहीं पाई कि ’’चुंबन के दौरान आपके मुंह से बदबू कतई नहीं आनी चाहिए, अन्यथा आप इसके ’सुख’ से बेदखल किए जा सकते हैं।’’
कई डाॅक्टरों और शोधकर्ताओं ने कुछ नए कारनामे भी लिखे हैं, जो चुंबन को शिद्दत से अंजाम देने का भरोसा दे रहे हैं। ’’जोश के साथ इसे लेने से आप अपना वजन घटा सकते हैं। किसिंग से आप प्रतिमिनट कम से कम 6.4 कैलोरी खर्च करते हैं।’’ जैसे कई तथ्य ’चुंबन-लिस्ट’ के साथ चिपका दिए गए हैं। किसिंग का प्रमोशन और विज्ञापन कर रहे इंटरनेट को यहीं तसल्ली नहीं हुई है। कुछ तस्वीरों के ज़रिए उसने यूज़र्स खींचने के लिए नायक-नायिका की तस्वीरों का कटीला-कातिलाना जाल भी बिछा रखा है।
किस के किस्से समेंटने को अब धीरे-धीरे यू-ट्यूब की ओर बढ़ रहा हूं। चुंबन की फूटी किस्मत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मैं बंद कमरे में इस पर सर्च कर रहा हूं। परिवार से छिपकर, दरवाजा बंद कर, चुंबन का चरित्र, दहलीज़ और उसका भविष्य खोजने की कोशिश में जुटा हूं। इस विषय पर सर्च करते पकड़े जाने पर अपनी मासूम छवि बिगड़ने का डर है, साथ ही परिवार के उन तानों का अंदाज़ा भी, जो ’चुंबन-खोज’ करते पकड़े जाने पर या तो मुझे अकेले में बैठाकर या ज़ोर-ज़ोर से डांटकर दिए जा सकते हैं। अफसोस इस बात का है कि यू-ट्यूब पर सर्च करने पर एक भी ऐसा चुंबन नहीं मिला, जो मां ने बेटे के माथे पर दिया हो, या एक भाई ने राखी बांधती अपनी बहन को !
1933 मंे आई फिल्म कर्मा में असल जि़ंदगी के दंपत्ति हिमांशु राय और देविका रानी का झिझकते हुए 4 मिनट का किसिंग सीन खूब चर्चा में रहा था। उस वक्त यह खबर महीनों मीडिया के लिए बड़ी खबर बनी रही। हालांकि सीन पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली और पर बीते दिनों इस दृश्य को एक फिल्म समारोह में दिखाया गया। फिल्मों में फिल्माए गए चुंबनों में तब और अब का बेहद फर्क आ गया है। सूरत से सीरत तक, मतलब से मायनों तक चुंबन की दास्तां अब पर्दे के पीछे छिप रही है। लुका-छिपी के बीच अब चुंबन एक ऐसा हौवा बन चुका है, जो सार्वजनिक तो क्या, सर्वमान्य भी नहीं रहा। बॉलीवुड में चुंबन स्पेशल अभिनेता कहे जाने वाले इमरान हाशमी हों या नए तरीकों से किसिंग को अंजाम दे रहे रणदीप हुड्ढा, नई पीढ़ी के नायकों ने यूथ-फैशन और आधुनिकता की पीठ पर चढ़कर चुंबन को अश्लीलता और कामुकता का चैकीदार बना दिया है।
नए नायकों में चुंबनस्टार बनकर उभरे वरुण धवन, शाहरुख खान, रनवीर कपूर, अर्जुन कपूर, व ढेरों ऐसे नायक हैं, जो अपनी हालिया फिल्मों में लंबे चुंबन दृश्यों की बदौलत ज़बर्दस्त चर्चा में रहे। क्या आज के दौर में ऐसा चुंबन ही सर्वमान्य है जो सिर्फ नायक-नायिका की मुहब्बत बयां करे ? प्यार और इश्क को आपस में उलझते देख चुंबन भी क्या एक वीरान बीहड़ में दौड़ पड़ा है ?
अब फिल्मों में बेटा मां का माथा चूमने की बजाय हाइ-हेलो कर चला जाता है। क्या भविष्य में चुंबन सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका की जागीर बनकर रह जाएगा ? बाकी रिश्तों में चुंबन क्या ठीक उसी तरह फलाॅप हो जाएगा, जैसे केबल युग आने के बाद एंटिना सिस्टम ..? चुंबन के मायने खतरे में हैं।  किसिंग के किस्से यदि ज्यादा दिनों तक अश्लील और फूहड़ प्रेम की वैसाखी बने रहे तो वह दौर दूर नहीं, जब चुंबन सिर्फ वर्गविशेष साहित्य व सिनेमा की पहचान बन जाएगा। तब न हाथ चूमते बुजुर्गों के होंठ होंगे, ना मां का माथा चूमता बेटा। किस से लेकर चुंबन और पप्पी से लेकर पुच्ची को एक बार फिर संस्कारों और विचारों में तवज्जो देने की ज़रूरत है। कहीं ऐसा न हो कि चुंबन चुनिंदा दिनों और चंद लम्हों की पहचान भर रह जाए !


Thursday, 25 April 2013


फूहड़ता के अँधेरे में सादगी का सूरज 
       


अर्थपूर्ण कॉमेडी ने हर दिल को छुआ, गुदगुदाया है, जबकि डबल मीनिंग कंटेंट पर हमेशा अच्छे-बुरे, सही-गलत की तलवारें तनी है। ’चिडि़याघर’ जैसे सफल टी.वी. सीरियलों ने साबित कर दिया है कि फेमिली स्पेशल एंज्वॉयमेंट ,भारत में न कभी फ्लाॅप हुआ था, और न होगा।


हंसी-मज़ाक और गंभीरता कभी एक साथ नहीं रह सकते। गंभीरता को तोड़ने के लिए हास्य की मांग है और हास्य की मज़बूरी है कि वह दर्शकों के होंठों पर हर कीमत पर मुस्कान लाये, उन्हें गुदगुदाये। कई हास्य-कलाकारों ने डबल मीनिंग कॉमेडी यूं ही नहीं अपनाई। दरअसल उन्हें दहाड़ें मारकर हंसने वाले दर्शक नहीं मिल रहे थे। आधुनिकता के इस शोरगुल में अर्थपूर्ण कॉमेडी पर तीखी बहसें तो हुईं, पर टीआरपी और लोकप्रियता की रेस में तमाम कॉमेडी कार्यक्रम एक रुटीन-फूहड़ स्पेशल शो बन कर रह गए। हिम्मत हारकर तमाम हास्य कलाकारों ने भी डबलमीनिंग कंटेंट से हाथ मिला लिया।
 मुंगेरीलाल, जसपाल भट्टी जैसे दिग्गजों ने एक सदी में हास्य का नया मंच और मुकाम तैयार किया था, जिसे सब टीवी के सीरियल ’चिडि़याघर’ में गधा प्रसाद जैसे हास्य किरदारों ने आगे बढ़ाया है। कैसे फैशन और भागमभाग के इस दौर में भी परिवार में, परिवार के साथ और परिवार के लिए, चिडि़याघर जैसे सीरियल अलग पहचान और सम्मान का नया इतिहास रच रहे हैं। गधा प्रसाद जैसे किरदारों की समीक्षा के लिए शब्द तो प्रयोग किए जा सकते हैं, पर उनके हुनर और अंदाज़ का हर पहलू समेंट पाना वाकई मुश्किल है।
अश्विनी धीर निर्देशित ’चिडि़याघर’ में यूं तो एक वनारसी परिवार की कहानी को दर्शकांे से जोड़ने की कोशिश की गई है, पर असल में सीरियल की जान जीतू शिवहरे ही हैं। जिन्होंने गधा प्रसाद का किरदार लाखों-करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर ला दिया है। अब तक 367 ऐपीसोड्स में ’चिडि़याघर’ ने इस प्रतियोगी दौर में खूब नेम-फेम और शोहरत हासिल की है। सब चैनल के इस लोकप्रिय शो ने उस मिथ को ज़बर्दस्त तरीके से तोड़ा है जिसमें कहा गया था कि आज के दौर में डबल-मीनिंग हास्य ही हिट करवाया जा सकता  हैं।
चिडि़याघर के इस घर में अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने केसरी नारायण के किरदार को देश के उन तमाम मध्यमवर्गीय पिताओं की तरह निभाया है, जो अपने परिवार की खुशियों में जश्न मनाते हैं, और गम के बादल छाने पर सूझबूझ से सामना करने की हिम्मत देते हैं। घर में दो बेटे हैं, जिन्हें घोटक और गोमुख की शक्ल दी है अभिनेता परेश और सुमित अरोड़ा ने, जो बेहतर अभिनय लिए, अपने किरदार की काबिलियत और मूर्खता का मिक्सचर परोसते चलते हैं। बाकी किरदारों में नौंक-झौंक और आपसी प्यार की बेजोड़ झलक दिखती है, जो ’चिडि़याघर’ को हर उस परिवार से जोड़ती है, जिन्हें बाकी चैनलों पर चिकनी-चमेली या लैला-मुन्नी के अलावा कुछ खास नहीं मिल पाता।
डी.डी. नेशनल के कुछ खास धारावाहिकों में हरी मिर्ची-लाल मिर्ची, कानाफूसी जैसे पारिवारिक इमोशनल सीरियलों ने घर-घर में खूब पहचान बनाई थी। पिछले कुछ सालों में निजी चैनलों की भरमार ने ऐसे सीरियलों से लोगों का ध्यान हटाना शुरु किया और धीरे-धीरे  दर्शकों की रुचि का हवाला देकर फूहड़ता परोसी जाने लगी। तमाम हास्यकवि स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर डबलमीनिंग शरारतों का शर्बत बांटने लगे, तो कॉमेडी के कुछ तथाकथित कार्यक्रमों ने पारिवारिक सीमाएं लांघकर एक नया दर्शक वर्ग बांध लिया, जिसके दम पर ही टीआरपी और लोकप्रियता का पैमाना तय होने लगा।
’मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ सपनों में ही रह गए तो ’देख भाई देख’ जैसे अर्थपूर्ण कॉमेडी कार्यक्रम की कद्र कम होती रही। सब टीवी के बेहद चर्चित ’’ऑफिस-ऑफिस’’ में ज़रूर नौकरी-पेशा वर्ग की हकीकत पेश की गई, जिसे पंकज कपूर ने अपने ज़बर्दस्त अभिनय से यादगार बना दिया। कॉमेडी की ज़मीन पर अर्थ-अनर्थ, हद के अंदर, हद के बाहर जैसी छिटपुट झड़पें चलतीं ही रहेंगी, पर खुश होने की बात ये है कि चिडि़याघर, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, वाह वाह क्या बात है जैसे सीरियल जब तक जि़ंदा हैं, हमें अर्थपूर्ण हास्य को लेकर परेशान होने की कतई ज़रूरत नहीं है।
उस हंसी का कोई मतलब नहीं है, जो हमें परिवार के सामने होंठ खोलने पर शर्मिंदा करे। लाख कोशिशों के बावजूद डबल मीनिंग कंटेंट से पैदा हुई मुस्कराहट हमेशा दबी-सहमी व निजी ही होगी। दिल से हंसने के लिए हमें आज भी व्यावहारिक और पारंपरिक मसखरी की ज़रूरत है। जब तक गधा प्रसाद जैसे किरदार जि़ंदा हैं न तो हास्यकलाकारों को निराश होने की ज़रूरत है और ना ही हम दर्शकों को। आखिर हंसी ही तो है जो स्वास्थ्य और स्वभाव दोनों के लिए ज़रूरी है। भारत में आधुनिकता का अंधा दौर हावी तो हुआ है पर इतना नहीं कि हम घर-परिवार से छिपकर व दूर बैठकर फूहड़ता की गप्पें सुनें और लंबे समय तक उन पर ही ठहाके लगाएं !




Monday, 22 April 2013


 चुभ ना जाए कहीं शक की यह सुई 
         

क्‍यों न ये समझा जाए कि हमारे यहां जब पुख्ता सबूतों का सूखा पड़ जाता है, तब शक के बयानों की तेज़ बौछार की जाती है। बेबुनियाद इल्ज़ाम देश की सुरक्षा को चकनाचूर कर सकते हैं। शक की सुइयां चुभतीं तो आतंकियों को हैं, पर देर-सवेर, दर्द आम-निर्दोष नागरिकों को ही सहना पड़ता है।


दो देश हैं। एक ताकत की महाशक्ति है, दूसरा संस्कारों की। एक के पास विश्वस्तरीय  आधुनिक तकनीक है, तो दूसरा अभी विकास की कच्ची सड़क पर घुटनों के बल चलने की कोशिश में। एक सदियों से विकसित है, तो दूसरे ने अभी धीमी रफ्तार ही पकड़ी है। बात भारत और अमेरिका की। पिछले दिनों अमेरिका के बोस्टन शहर में जब मैराथन की धूम मची थी, तेज़ धमाकों से तीन की मौत हुई, व लगभग 140 लोग घायल हुए। अगले दिन भारत के बेंगलुरू में भाजपा कार्यालय के करीब धमाका हुआ, जिसमें 11 पुलिसकर्मी समेत 16 लोग घायल हुए। अफरातफरी के इस माहौल में दो देशों की तुलना करना आपको थोड़ा अजीब लग सकता है। पर कुछ पहलू हैं, जिनसे हमें ऐसे धमाकों के बाद का माहौल संभालना, अमेरिका से सीखने की ज़रूरत है।
विश्व की शक्तिशाली शख्सियत अमेरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 9 11 के बाद हुए इस दिल दहला देने वाले विस्फोट पर आनन-फानन किसी नस्लवादी-आतंकवादी गुट पर शक की सुई नहीं घुमाई। वहीं बेंगलुरु मे हुए धमाके के चंद मिनटों बाद ही भारत की सियासत में शक का शर्बत घुलने लगा। इंडियन मुजाहिदीन पर, संदेह के बयान आनन-फानन सार्वजनिक कर दिए गए। क्या ऐसे माहौल में, जब देश के नागरिक खतरे में हों, बेबुनियाद इल्ज़ाम की तलवार लहराना ठीक है ..? क्यंू न ये समझा जाये कि हमारे यहां जब पुख्ता सबूतों का सूखा पड़ जाता है, तब शक के बयानों की तेज़ बौछार की जाती है। सियासत और शक के इस भंवर में फंस जाता है वो आम आदमी, जो दो वक्त की रोटी से खुश है, जिसे अपना व परिवार का पेट पालना है, जि़ंदगी ने उसे जो कुछ दिया है, उसी में जीने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका में हमलों की सूची पर नज़र डालें तो दिसंबर 1975 में न्यूयार्क के लाॅ गार्डिया एयरपोर्ट के लाॅकर रूम में हुए हमले में 11 ने अपनी जान गंवाई। फरवरी 1993 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर के पार्किग जोन में खड़े ट्रक में हमला हुआ, जिसमें 6 की जानें गई, 1000 घायल बताये गए। अप्रैल 1995 में ओखलामा सिटी में संघीय सरकार के दफतर में ट्रक उड़ाया गया जिसमें 168 की मौत व 500 बुरी तरह घायल हुए। जुलाई 1996 में अटलांटा के सेंटेनियल ओलंपिक पार्क में समर ओलंपिक में धमाका हुआ, जिसमें दो ने जान गंवाई। फिर एक ऐतिहासिक हमला जिसे बयां करने की शायद ज़रूरत नहीं, पर आंकड़ों की इस अभागी औपचारिकता में उसे 9 11, कहा गया है, साथ ही विश्व के सबसे दर्दनाक हमलों में इसकी गिनती है।
 इनमें से किसी भी धमाकों के पन्ने पलटने पर शक की सुई हवा-हवाई तरीके से घूमती नज़र नहीं आती। अमरीकी सत्ताधारियों ने अपने एक-एक नागरिक की जान की शिद्दत से हिफाज़त की है। यहां ये भी बात काबिल-ए-गौर है कि हमले के दौरान सिर्फ न्याय दिलाने के दिलासे व दोषियों पर सख्त सज़ा के बयान ही सार्वजनिक तौर पर दिए गए। किसी भी पुख्ता जि़म्मेदारी-सबूत के अभाव में शक का ठीकरा आतंकवादी गुटों पर नहीं फोड़ा गया। वरिष्ठ पत्रकार अमित बरुआ कहते हैं ’’ऐसे समय में बेवज़ह फिंगरप्वाइंटिंग करना देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है। बेहतर होगा कि हमलों की पुष्टि होने या सबूत मिल जाने के बाद ही हमलावरों का नाम सार्वजनिक हो।’’ मिसाल देना गलत नहीं है कि अमेरिका ने 9 11 के बाद आतंकियों के मंसूबों से अमेरिकियों की हरसंभव हिफाज़त की है। दो मामलों में तो अंतिम समय में विस्फोट होने से बचा लिया गया, जिनमें एक नाइजीरियन एवं टाइम्स टाॅवर में एक पाकिस्तानी नागरिक को पकड़ा गया था। दरअसल आतंकवादी अक्सर यह फाॅर्मूला पेश करते आये हैं कि ’’आपको हमेशा भाग्यशाली बने रहना है, वे कभी भी आपको परख सकते हैं।’’ साफ ज़ाहिर है कि चुस्त-तकनीक से लैस अमेरिकी पुलिस बेहद दम-खम से सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही थी लेकिन कहीं न कहीं बोस्टन में उससे चूक हुई है, जिसे वहां के प्रशासन ने बेझिझक स्वीकार भी किया है।
अब नज़र कर्नाटक में ही हुए कुछ हमलों पर। 17 अप्रैल 2010 को बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर शाम 4 बजे दो धमाकों में सात घायल हुए, जुलाई 2008 में शहर के 9 स्थानों पर सीरियल धमाकों में दो की मौत हुई, मई 2008 कर्नाटक के हुबली जिले में सत्र न्यायालय परिसर में धमाका, सितंबर 2005 में उत्तरी बेंगलुरु के साइंस इंस्टीट्यूट पर आतंकी हमला। इसके अलावा राजधानी दिल्ली व देश के तमाम शहरों के हमलों की भी लंबी सूची है, जिनमें दूर-दूर तक कोई ऐसा नहीं मिलता, जिसके होने के बाद यहां के नौकरशाहों-नेताओं ने शक के आधार पर इल्जामों की झड़ी न लगाई हो।  बेंगलुरु के हालिया हमले के लगभग कुछ मिनट बाद ही इंडियन मुजाहिदीन पर संदेह की पुष्टि कर दी गई। शहर के गृहमंत्री ने भी बेहिचक, हमलों के बाद शक और संदेह की इस घातक बयानवाज़ी का जमकर समर्थन किया। हालांकि औपचारिकताओं की ज़रूरत ऐसे समय में होती है, इसमें दो राय नहीं, पर दूसरा पहलू क्या यह नहीं कि निर्दोष गुट पर शक करने से वह सक्रिय हो सकता है, भड़क सकता है, और मौका लगने पर कभी भी हम पर उम्मीद से कहीं ज्यादा हमलावर हो सकता है ?
आतंकवादियों का न तो कोई मज़हब है, और न ही घर-परिवार। वे फ्रस्ट्रेशन को जि़ंदगी और जेहाद को जन्नत मानकर जीते हैं। बीते कुछ सालों से भारत में हुए तमाम हमलों में इस शक-फोबिया ने हमें नुकसान ही पहुंचाया है। सिक्यूरिटी एक्सपर्ट प्रविंद्र स्वामी अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहते हैं, कि ’’बोस्टन में हुए हमलों में वहां के समझदार नेता और राष्ट्रपति ने तो धमाके का किसी पर इल्जाम नहीं दिया, पर भारत के ’अमेरिका-हिमायतियों’ ने संदेह के बयान उछालने शुरु कर दिए थे। कोई लश्कर-ए-तैयबां की साजिश का दोषगान कर रहा था तो किसी की जुबान पर आईऐम गुट के चर्चे थे।’’ आंतरिक मामलों के तमाम विशेषज्ञों की भी यही राय है कि बिना किसी सबूत, गवाह के उंगली उठाने में हमारा ही नुकसान है। ठीक वैसे ही, जब आप किसी पर लगातार चोरी का इल्जाम लगाते रहें, और एक दिन तंग आकर वह आपको ढंग से लूट ले।
बोस्टन-ब्लास्ट में घायलों को समय रहते इलाज़, मौके पर मौजूद एंबुलेंस, चुस्त आपात दल जैसी कई ख्ूाबियां भारत जैसे तमाम देशों के लिए आइना तो हैं ही साथ ही हमलों के बाद का माहौल वश में रखने की कला भी अमेरिकी सत्ताधारियों से सीखने की ज़रूरत है। आधुनिकता-पिछड़ेपन की दीवारों से आगे भी एक नया सूरज उग सकता है, जो भारत को  हमलों के अंधेरे में सियासत का नहीं सूझबूझ का उजाला दे सके। देश के नागरिकों केा संदेह और शक की खाली ज़मीन नहीं, पुख्ता सबूतों से जुड़ी न्याय और सुरक्षा की इमारत चाहिए। शक की सुइयां चुभतीं तो आतंकियों को हैं, पर देर-सवेर, दर्द हमें ही सहना पड़ता है। यहां इस लेख के मायने आतंकियों का पक्ष रखने के कतई न निकालें। साफ शब्दों में मेरी निजी राय यही है कि दहशत और दिलासों के इस मंज़र में सोते शेर को जगाने जैसे खतरे किसी भी हालत में मोल नहीं लिए जाने चाहिए।
                                         

Thursday, 18 April 2013


 सिर्फ ढांढस नहीं, उम्मीद भी बंधाएं 


चिकित्सा क्षेत्र के तमाम विशेषज्ञों की सलाह है कि हाइड्रोसिफेलिस जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ रहे पीडि़तों को सिर्फ ढांढस या सांत्वना का सिराहना नहीं, उम्मीद-उत्साह की नई किरण चाहिए। आइए हम और आप एक वादा करें, तकलीफ और दर्द से कराहते किसी भी रोगी को ये भरोसा दिलाएं कि ’एक दिन वह बिल्कुल ठीक हो जायेगा, और उस जैसे तमाम लोग ठीक हुए भी हैं।


किलकारियां चीख बन जातीं हैं, ख्वाब बुरे सपनों में बदल जाते हैं, सांसें सिसकने लगतीं हैं, और खुशियां कोसों दूर खड़े होकर तमाशा देखा करतीं हैं। घर-आंगन में एक मासूम खिलखिलाता तो है, पर उसकी तकलीफ का अंदाज़ा या तो परिवार या वो खुद ही लगा सकता है। जन्म लेते ही उसे एक ऐसा रोग जकड़ लेता है, जिसे ना मासूमियत से प्यार है और ना मुस्कराहट की परवाह। जो सिर्फ जानलेवा और बेहद दर्दनाक लम्हों को हंसती-खेलती जि़ंदगी पर उड़ेलने आता है। हर दिन, हर पल, हर मिनट मानो जान लेने को धमकी सी देता रहता है। बात हाइड्रोसिफेलिस रोग की। दिमाग में कई लीटर पानी भरने से सिर का साइज़ सामान्य से कई गुणा बढ़ जाता है। चिडचिड़ापन, असहनीय दर्द और जि़ंदगी-मौत के इस डरावने खेल ने कई मासूमों की मुस्कराहट तो छीन ही ली है, साथ ही उन परिवारों का भी सुख-चैन छीन लिया है, जो अपने लाड़ले की इस हालत को नम आंखों से देखने-महसूस करने को मजबूर हैं।
दिमाग में सीएसऐफ (सफेद पानी) भरने लगता है, और जैसे-जैसे वह तय जगह से ज्यादा में फैलता है, दिमाग में लचीलापन पैदा होता है, और कुछ महीनों में सिर सामान्य से बड़ा दिखने लगता है। जैसे-जैसे पानी स्पाइनल काॅर्ड में भरता जाता है, असहनीय दर्द के साथ-साथ बे्रन टिश्यू एक्सपेंड हेाने लगते हैं। हाइड्रोसिफेलिस रोगियों पर अभी आधिकारिक आंकड़े तैयार नहंी हैं, पर आधिकारिक जानकार बताते है कि विश्व के हर 500 में एक बच्चा इस जानलेवा बीमारी की जकड़ में है। चिकित्सकांे की सख्त सलाह है कि इस रोग में हिम्मत हारने की सज़ा जि़ंदगी गंवाकर भुगतनी पड़ सकती है। प्रेरित करने, व उम्मीद जगाने वालों की कमी ने हाइड्रोसिफेलस से मरने वालों की संख्या बेतहाशा बढ़ा दी है। हालांकि आधुनिक विज्ञान के ताबड़तोड़ आविष्कारों ने इस रोग से लड़ने के कई औज़ार तैयार किए हैं, जिनमें ’अल्ट्रासाॅनोग्राफी’ और कंप्यूटर टेंपोग्राफी, खासा कारगर है।
वाशिंगटन के शरमन ऐलेक्सी उन लोगों के लिए वाकई मिसाल साबित हो सकते हैं जिन्होंने इस बीमारी को जि़ंदगी की आखिरी सीढ़ी मान लिया है। ऐलेक्सी का जन्म 1966 में इसी बीमारी के साथ हुआ था, जिसका नाम काफी बाद में हाइड्रोसिफेलिस रखा गया। 6 साल की उम्र में उनके दिमाग की सर्जरी हुई, जिसको लेकर परिवार को एक अजीब सा डर था। उनकी याद्दाश्त खोने का, व शायद जान से चले जाने का भी। इसी डर के आगे शरमन ने परिवार के साथ इस जंग को जीता। इलाज़ के बाद वे बिल्कुल स्वस्थ्य तो नहीं, पर पहले से काफी बेहतर हो चुके थे। उनके शराबी पिता, उन्हें व उनके पांच भाइयों को छोड़कर चले जाते थे। परिस्थतियों और परेशानियों को दरकिनार करते हुए, ऐलेक्सी ने अपना नाम ’दा ग्लोब’ रखा। ( चूंकि हाइड्रोसिफेसिल में सिर का आकार कई गुणा बढ़ जाता है।)
सर्जरी के बाद उन्हें काफी हैवी दवाइयाँ लेनी पड़ती थीं, जो उन्हें खुश और कंफर्टिबल महसूस नहीं होने देतीं थीं। बावज़ूद इसके उन्होंने पढ़ने का मन बनाया और आॅटो मैकेनिक इंजिनियरिंग से लेकर तमाम दार्शनिकों के किस्से-कहानियां पढ़ीं। धीरे-धीरे साहित्य के बीच रहते-रहते ऐलेक्सी ने साहित्य को ही अपना शौक और जुनून बना लिया। मशहूर अमरीकी-चीनी कवि ऐलेक्स क्युओ के लैक्चर ने उन पर ऐसा असर डाला कि शब्दों और विचारों की ज़मीन पर शरमन ने अपनी हर तकलीफ कुर्बान कर दी। कुछ समय बाद सफलता ने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी। शराब पीने की जिस आदत ने उन्हें वाशिंगटन यूनीवर्सिटी से बाहर किया था, उसी यूनीवर्सिटी ने एलेक्सी को 1995 में स्नातक की मानद डिग्री से नवाज़ा। 2005 से अब तक वे लांग हाउस मीडिया के फाउंडर बोर्ड मेंबर हैं। यह संस्था अमरीकी युवाओं को फिल्म-निर्माण में आगे आने का मौका देती है। ’दा बेस्ट अमेरिकन शाॅर्ट स्टोरी, पुशर्ट प्राइज़ जैसी रचनाआंे ने उन्हें सिलेब्रिटी की कतार में ला खड़ा किया है। हाइड्रोसिफेलिस रोग पर तमाम कविताओं और आर्टिकल्स में उनकी बेजोड़ निर्भीकता और सहने की बेइंतिहां झलक है। वे इन रोग-पीडि़तों को नई जिं़दगी जीने की सीख तो देते ही हैं, साथ ही अपने अनुभवों से उनमें नया जोश भी भरते हैं।
दरअसल डाॅक्टर्स की राय यह भी है कि हाइड्रोसिफेलिस दिमागी बीमारी है, जो सोचने-समझने में दिक्कत पैदा करती है। रोग के बारे में बुरे-डरावने खयाल मन में लाना, इस बीमारी को और बढ़ा देता है। यदि सामने खड़ा व्यक्ति ज़रूरत से ज्यादा आश्चर्य से रोगी को सहानुभूति देने की कोशिश करता है तो पीडि़त, असहनीय दिमागी दर्द से तिलमिला उठता है। रोग कोई भी हो, उससे हार मान लेने से वह बढ़ता ही है। कहते भी हैं कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। आखिरकार सबसे असरदार इलाज़ आत्मविश्वास और उम्मीद ही तो है !
बीते दिनों त्रिपुरा में हाइड्रोसिफेलस और जि़ंदगी के बीच जंग लड़ रहीं 18 वर्षीय रूना बेगम का मामला काफी देर से सामने आया है। पिता ईंट-भट्टे में मज़दूर है और गरीबी का राक्षस मूंह बाये खड़ा है। मां और तीमारदारों से घिरी रूना के पास सहानुभूति के आंसू तो हैं पर अफसोस कि इलाज़ के लिए लाखों की रकम नहीं। सरकार और सियासत ने आंकड़ों को भले ही दबा दिया हो, पर धीरे-धीरे यह रोग पैर पसार रहा है। आत्मविश्वास जगाने से ज्यादा ढांढस बंधाने वालों की भीड़ है। ऐसे में देशी-विदेशी डाॅक्टर्स की साफ चेतावनी है कि रोगी को असहज महसूस करवाना उसकी जान से खेलने जैसा है। यदि आप हाथ फेरकर उसका दर्द महसूस करने की कोशिश में हैं, तो सावधान यह उसकी जान भी ले सकता है।
तकलीफ और तकल्लुफ़ की इस तेज़ धार में हमें सहानुभूति की नहंी, मज़बूत इरादों  की नाव खोजनी है। रोग के इलाज़ को आसानी से उपलब्ध तो करवाना ही होगा, साथ ही आत्मविश्वास और खुशमिजाज़ी का भी परिचय देना होगा। असहजता सिर्फ इसी रोग के लिए नहीं, इस जैसी तमाम गंभीर बीमारियों के लिए मुसीबत पैदा कर रही है। तमाम लोग जानलेवा और भयानक कहकर रोगी और उसके परिवार को अंदर से बुरी तरह तोड़कर रख देते हैं। ज़रूरत है इलाज के साथ-साथ प्रेरणा की भी, ऐसी इंस्पिरेशन, जो किसी की जि़ंदगी मंे खुशियां ला सकें, उसे यह भरोसा दिला सके, कि जीने के लिए सभी को खुदा ने संघर्ष सौंपा है।
 बस फर्क इतना है कि किसी को बेहद तकलीफ है तो कोई मुस्कराते हुए जी रहा है। दवा और दुआओं के साथ जिस दिन प्रेरित करने वाले भी आगे आएंगे, तो असहनीय दर्द भूलकर हाइड्रोसिफेलस जैसे रोगियों को कुछ ही सही, पर सुकून ज़रूर मिलेगा। आइए हम और आप एक वादा करें, तकलीफ और दर्द से कराहते  किसी भी रोगी को ये भरोसा दिलाएं कि ’एक दिन वह बिल्कुल ठीक हो जायेगा, और उस जैसे तमाम लोग ठीक हुए भी हैं। हो सकता है कई लोग झूठी उम्मीद बंधाने को गलत मानते हों, पर क्या कोई झूठ किसी की जान से बढ़कर हो सकता है ?
मयंक दीक्षित
                                                 स्वतंत्र पत्रकार, कानपुर।
सोर्स आॅफ इमेज एंड कंटेंटः गूगल ।