Monday, 22 April 2013


 चुभ ना जाए कहीं शक की यह सुई 
         

क्‍यों न ये समझा जाए कि हमारे यहां जब पुख्ता सबूतों का सूखा पड़ जाता है, तब शक के बयानों की तेज़ बौछार की जाती है। बेबुनियाद इल्ज़ाम देश की सुरक्षा को चकनाचूर कर सकते हैं। शक की सुइयां चुभतीं तो आतंकियों को हैं, पर देर-सवेर, दर्द आम-निर्दोष नागरिकों को ही सहना पड़ता है।


दो देश हैं। एक ताकत की महाशक्ति है, दूसरा संस्कारों की। एक के पास विश्वस्तरीय  आधुनिक तकनीक है, तो दूसरा अभी विकास की कच्ची सड़क पर घुटनों के बल चलने की कोशिश में। एक सदियों से विकसित है, तो दूसरे ने अभी धीमी रफ्तार ही पकड़ी है। बात भारत और अमेरिका की। पिछले दिनों अमेरिका के बोस्टन शहर में जब मैराथन की धूम मची थी, तेज़ धमाकों से तीन की मौत हुई, व लगभग 140 लोग घायल हुए। अगले दिन भारत के बेंगलुरू में भाजपा कार्यालय के करीब धमाका हुआ, जिसमें 11 पुलिसकर्मी समेत 16 लोग घायल हुए। अफरातफरी के इस माहौल में दो देशों की तुलना करना आपको थोड़ा अजीब लग सकता है। पर कुछ पहलू हैं, जिनसे हमें ऐसे धमाकों के बाद का माहौल संभालना, अमेरिका से सीखने की ज़रूरत है।
विश्व की शक्तिशाली शख्सियत अमेरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 9 11 के बाद हुए इस दिल दहला देने वाले विस्फोट पर आनन-फानन किसी नस्लवादी-आतंकवादी गुट पर शक की सुई नहीं घुमाई। वहीं बेंगलुरु मे हुए धमाके के चंद मिनटों बाद ही भारत की सियासत में शक का शर्बत घुलने लगा। इंडियन मुजाहिदीन पर, संदेह के बयान आनन-फानन सार्वजनिक कर दिए गए। क्या ऐसे माहौल में, जब देश के नागरिक खतरे में हों, बेबुनियाद इल्ज़ाम की तलवार लहराना ठीक है ..? क्यंू न ये समझा जाये कि हमारे यहां जब पुख्ता सबूतों का सूखा पड़ जाता है, तब शक के बयानों की तेज़ बौछार की जाती है। सियासत और शक के इस भंवर में फंस जाता है वो आम आदमी, जो दो वक्त की रोटी से खुश है, जिसे अपना व परिवार का पेट पालना है, जि़ंदगी ने उसे जो कुछ दिया है, उसी में जीने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका में हमलों की सूची पर नज़र डालें तो दिसंबर 1975 में न्यूयार्क के लाॅ गार्डिया एयरपोर्ट के लाॅकर रूम में हुए हमले में 11 ने अपनी जान गंवाई। फरवरी 1993 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर के पार्किग जोन में खड़े ट्रक में हमला हुआ, जिसमें 6 की जानें गई, 1000 घायल बताये गए। अप्रैल 1995 में ओखलामा सिटी में संघीय सरकार के दफतर में ट्रक उड़ाया गया जिसमें 168 की मौत व 500 बुरी तरह घायल हुए। जुलाई 1996 में अटलांटा के सेंटेनियल ओलंपिक पार्क में समर ओलंपिक में धमाका हुआ, जिसमें दो ने जान गंवाई। फिर एक ऐतिहासिक हमला जिसे बयां करने की शायद ज़रूरत नहीं, पर आंकड़ों की इस अभागी औपचारिकता में उसे 9 11, कहा गया है, साथ ही विश्व के सबसे दर्दनाक हमलों में इसकी गिनती है।
 इनमें से किसी भी धमाकों के पन्ने पलटने पर शक की सुई हवा-हवाई तरीके से घूमती नज़र नहीं आती। अमरीकी सत्ताधारियों ने अपने एक-एक नागरिक की जान की शिद्दत से हिफाज़त की है। यहां ये भी बात काबिल-ए-गौर है कि हमले के दौरान सिर्फ न्याय दिलाने के दिलासे व दोषियों पर सख्त सज़ा के बयान ही सार्वजनिक तौर पर दिए गए। किसी भी पुख्ता जि़म्मेदारी-सबूत के अभाव में शक का ठीकरा आतंकवादी गुटों पर नहीं फोड़ा गया। वरिष्ठ पत्रकार अमित बरुआ कहते हैं ’’ऐसे समय में बेवज़ह फिंगरप्वाइंटिंग करना देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है। बेहतर होगा कि हमलों की पुष्टि होने या सबूत मिल जाने के बाद ही हमलावरों का नाम सार्वजनिक हो।’’ मिसाल देना गलत नहीं है कि अमेरिका ने 9 11 के बाद आतंकियों के मंसूबों से अमेरिकियों की हरसंभव हिफाज़त की है। दो मामलों में तो अंतिम समय में विस्फोट होने से बचा लिया गया, जिनमें एक नाइजीरियन एवं टाइम्स टाॅवर में एक पाकिस्तानी नागरिक को पकड़ा गया था। दरअसल आतंकवादी अक्सर यह फाॅर्मूला पेश करते आये हैं कि ’’आपको हमेशा भाग्यशाली बने रहना है, वे कभी भी आपको परख सकते हैं।’’ साफ ज़ाहिर है कि चुस्त-तकनीक से लैस अमेरिकी पुलिस बेहद दम-खम से सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही थी लेकिन कहीं न कहीं बोस्टन में उससे चूक हुई है, जिसे वहां के प्रशासन ने बेझिझक स्वीकार भी किया है।
अब नज़र कर्नाटक में ही हुए कुछ हमलों पर। 17 अप्रैल 2010 को बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर शाम 4 बजे दो धमाकों में सात घायल हुए, जुलाई 2008 में शहर के 9 स्थानों पर सीरियल धमाकों में दो की मौत हुई, मई 2008 कर्नाटक के हुबली जिले में सत्र न्यायालय परिसर में धमाका, सितंबर 2005 में उत्तरी बेंगलुरु के साइंस इंस्टीट्यूट पर आतंकी हमला। इसके अलावा राजधानी दिल्ली व देश के तमाम शहरों के हमलों की भी लंबी सूची है, जिनमें दूर-दूर तक कोई ऐसा नहीं मिलता, जिसके होने के बाद यहां के नौकरशाहों-नेताओं ने शक के आधार पर इल्जामों की झड़ी न लगाई हो।  बेंगलुरु के हालिया हमले के लगभग कुछ मिनट बाद ही इंडियन मुजाहिदीन पर संदेह की पुष्टि कर दी गई। शहर के गृहमंत्री ने भी बेहिचक, हमलों के बाद शक और संदेह की इस घातक बयानवाज़ी का जमकर समर्थन किया। हालांकि औपचारिकताओं की ज़रूरत ऐसे समय में होती है, इसमें दो राय नहीं, पर दूसरा पहलू क्या यह नहीं कि निर्दोष गुट पर शक करने से वह सक्रिय हो सकता है, भड़क सकता है, और मौका लगने पर कभी भी हम पर उम्मीद से कहीं ज्यादा हमलावर हो सकता है ?
आतंकवादियों का न तो कोई मज़हब है, और न ही घर-परिवार। वे फ्रस्ट्रेशन को जि़ंदगी और जेहाद को जन्नत मानकर जीते हैं। बीते कुछ सालों से भारत में हुए तमाम हमलों में इस शक-फोबिया ने हमें नुकसान ही पहुंचाया है। सिक्यूरिटी एक्सपर्ट प्रविंद्र स्वामी अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहते हैं, कि ’’बोस्टन में हुए हमलों में वहां के समझदार नेता और राष्ट्रपति ने तो धमाके का किसी पर इल्जाम नहीं दिया, पर भारत के ’अमेरिका-हिमायतियों’ ने संदेह के बयान उछालने शुरु कर दिए थे। कोई लश्कर-ए-तैयबां की साजिश का दोषगान कर रहा था तो किसी की जुबान पर आईऐम गुट के चर्चे थे।’’ आंतरिक मामलों के तमाम विशेषज्ञों की भी यही राय है कि बिना किसी सबूत, गवाह के उंगली उठाने में हमारा ही नुकसान है। ठीक वैसे ही, जब आप किसी पर लगातार चोरी का इल्जाम लगाते रहें, और एक दिन तंग आकर वह आपको ढंग से लूट ले।
बोस्टन-ब्लास्ट में घायलों को समय रहते इलाज़, मौके पर मौजूद एंबुलेंस, चुस्त आपात दल जैसी कई ख्ूाबियां भारत जैसे तमाम देशों के लिए आइना तो हैं ही साथ ही हमलों के बाद का माहौल वश में रखने की कला भी अमेरिकी सत्ताधारियों से सीखने की ज़रूरत है। आधुनिकता-पिछड़ेपन की दीवारों से आगे भी एक नया सूरज उग सकता है, जो भारत को  हमलों के अंधेरे में सियासत का नहीं सूझबूझ का उजाला दे सके। देश के नागरिकों केा संदेह और शक की खाली ज़मीन नहीं, पुख्ता सबूतों से जुड़ी न्याय और सुरक्षा की इमारत चाहिए। शक की सुइयां चुभतीं तो आतंकियों को हैं, पर देर-सवेर, दर्द हमें ही सहना पड़ता है। यहां इस लेख के मायने आतंकियों का पक्ष रखने के कतई न निकालें। साफ शब्दों में मेरी निजी राय यही है कि दहशत और दिलासों के इस मंज़र में सोते शेर को जगाने जैसे खतरे किसी भी हालत में मोल नहीं लिए जाने चाहिए।
                                         

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