सिर्फ ढांढस नहीं, उम्मीद भी बंधाएं
चिकित्सा क्षेत्र के तमाम विशेषज्ञों की सलाह है कि हाइड्रोसिफेलिस जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ रहे पीडि़तों को सिर्फ ढांढस या सांत्वना का सिराहना नहीं, उम्मीद-उत्साह की नई किरण चाहिए। आइए हम और आप एक वादा करें, तकलीफ और दर्द से कराहते किसी भी रोगी को ये भरोसा दिलाएं कि ’एक दिन वह बिल्कुल ठीक हो जायेगा, और उस जैसे तमाम लोग ठीक हुए भी हैं।
किलकारियां चीख बन जातीं हैं, ख्वाब बुरे सपनों में बदल जाते हैं, सांसें सिसकने लगतीं हैं, और खुशियां कोसों दूर खड़े होकर तमाशा देखा करतीं हैं। घर-आंगन में एक मासूम खिलखिलाता तो है, पर उसकी तकलीफ का अंदाज़ा या तो परिवार या वो खुद ही लगा सकता है। जन्म लेते ही उसे एक ऐसा रोग जकड़ लेता है, जिसे ना मासूमियत से प्यार है और ना मुस्कराहट की परवाह। जो सिर्फ जानलेवा और बेहद दर्दनाक लम्हों को हंसती-खेलती जि़ंदगी पर उड़ेलने आता है। हर दिन, हर पल, हर मिनट मानो जान लेने को धमकी सी देता रहता है। बात हाइड्रोसिफेलिस रोग की। दिमाग में कई लीटर पानी भरने से सिर का साइज़ सामान्य से कई गुणा बढ़ जाता है। चिडचिड़ापन, असहनीय दर्द और जि़ंदगी-मौत के इस डरावने खेल ने कई मासूमों की मुस्कराहट तो छीन ही ली है, साथ ही उन परिवारों का भी सुख-चैन छीन लिया है, जो अपने लाड़ले की इस हालत को नम आंखों से देखने-महसूस करने को मजबूर हैं।
दिमाग में सीएसऐफ (सफेद पानी) भरने लगता है, और जैसे-जैसे वह तय जगह से ज्यादा में फैलता है, दिमाग में लचीलापन पैदा होता है, और कुछ महीनों में सिर सामान्य से बड़ा दिखने लगता है। जैसे-जैसे पानी स्पाइनल काॅर्ड में भरता जाता है, असहनीय दर्द के साथ-साथ बे्रन टिश्यू एक्सपेंड हेाने लगते हैं। हाइड्रोसिफेलिस रोगियों पर अभी आधिकारिक आंकड़े तैयार नहंी हैं, पर आधिकारिक जानकार बताते है कि विश्व के हर 500 में एक बच्चा इस जानलेवा बीमारी की जकड़ में है। चिकित्सकांे की सख्त सलाह है कि इस रोग में हिम्मत हारने की सज़ा जि़ंदगी गंवाकर भुगतनी पड़ सकती है। प्रेरित करने, व उम्मीद जगाने वालों की कमी ने हाइड्रोसिफेलस से मरने वालों की संख्या बेतहाशा बढ़ा दी है। हालांकि आधुनिक विज्ञान के ताबड़तोड़ आविष्कारों ने इस रोग से लड़ने के कई औज़ार तैयार किए हैं, जिनमें ’अल्ट्रासाॅनोग्राफी’ और कंप्यूटर टेंपोग्राफी, खासा कारगर है।
वाशिंगटन के शरमन ऐलेक्सी उन लोगों के लिए वाकई मिसाल साबित हो सकते हैं जिन्होंने इस बीमारी को जि़ंदगी की आखिरी सीढ़ी मान लिया है। ऐलेक्सी का जन्म 1966 में इसी बीमारी के साथ हुआ था, जिसका नाम काफी बाद में हाइड्रोसिफेलिस रखा गया। 6 साल की उम्र में उनके दिमाग की सर्जरी हुई, जिसको लेकर परिवार को एक अजीब सा डर था। उनकी याद्दाश्त खोने का, व शायद जान से चले जाने का भी। इसी डर के आगे शरमन ने परिवार के साथ इस जंग को जीता। इलाज़ के बाद वे बिल्कुल स्वस्थ्य तो नहीं, पर पहले से काफी बेहतर हो चुके थे। उनके शराबी पिता, उन्हें व उनके पांच भाइयों को छोड़कर चले जाते थे। परिस्थतियों और परेशानियों को दरकिनार करते हुए, ऐलेक्सी ने अपना नाम ’दा ग्लोब’ रखा। ( चूंकि हाइड्रोसिफेसिल में सिर का आकार कई गुणा बढ़ जाता है।)
सर्जरी के बाद उन्हें काफी हैवी दवाइयाँ लेनी पड़ती थीं, जो उन्हें खुश और कंफर्टिबल महसूस नहीं होने देतीं थीं। बावज़ूद इसके उन्होंने पढ़ने का मन बनाया और आॅटो मैकेनिक इंजिनियरिंग से लेकर तमाम दार्शनिकों के किस्से-कहानियां पढ़ीं। धीरे-धीरे साहित्य के बीच रहते-रहते ऐलेक्सी ने साहित्य को ही अपना शौक और जुनून बना लिया। मशहूर अमरीकी-चीनी कवि ऐलेक्स क्युओ के लैक्चर ने उन पर ऐसा असर डाला कि शब्दों और विचारों की ज़मीन पर शरमन ने अपनी हर तकलीफ कुर्बान कर दी। कुछ समय बाद सफलता ने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी। शराब पीने की जिस आदत ने उन्हें वाशिंगटन यूनीवर्सिटी से बाहर किया था, उसी यूनीवर्सिटी ने एलेक्सी को 1995 में स्नातक की मानद डिग्री से नवाज़ा। 2005 से अब तक वे लांग हाउस मीडिया के फाउंडर बोर्ड मेंबर हैं। यह संस्था अमरीकी युवाओं को फिल्म-निर्माण में आगे आने का मौका देती है। ’दा बेस्ट अमेरिकन शाॅर्ट स्टोरी, पुशर्ट प्राइज़ जैसी रचनाआंे ने उन्हें सिलेब्रिटी की कतार में ला खड़ा किया है। हाइड्रोसिफेलिस रोग पर तमाम कविताओं और आर्टिकल्स में उनकी बेजोड़ निर्भीकता और सहने की बेइंतिहां झलक है। वे इन रोग-पीडि़तों को नई जिं़दगी जीने की सीख तो देते ही हैं, साथ ही अपने अनुभवों से उनमें नया जोश भी भरते हैं।
दरअसल डाॅक्टर्स की राय यह भी है कि हाइड्रोसिफेलिस दिमागी बीमारी है, जो सोचने-समझने में दिक्कत पैदा करती है। रोग के बारे में बुरे-डरावने खयाल मन में लाना, इस बीमारी को और बढ़ा देता है। यदि सामने खड़ा व्यक्ति ज़रूरत से ज्यादा आश्चर्य से रोगी को सहानुभूति देने की कोशिश करता है तो पीडि़त, असहनीय दिमागी दर्द से तिलमिला उठता है। रोग कोई भी हो, उससे हार मान लेने से वह बढ़ता ही है। कहते भी हैं कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। आखिरकार सबसे असरदार इलाज़ आत्मविश्वास और उम्मीद ही तो है !
बीते दिनों त्रिपुरा में हाइड्रोसिफेलस और जि़ंदगी के बीच जंग लड़ रहीं 18 वर्षीय रूना बेगम का मामला काफी देर से सामने आया है। पिता ईंट-भट्टे में मज़दूर है और गरीबी का राक्षस मूंह बाये खड़ा है। मां और तीमारदारों से घिरी रूना के पास सहानुभूति के आंसू तो हैं पर अफसोस कि इलाज़ के लिए लाखों की रकम नहीं। सरकार और सियासत ने आंकड़ों को भले ही दबा दिया हो, पर धीरे-धीरे यह रोग पैर पसार रहा है। आत्मविश्वास जगाने से ज्यादा ढांढस बंधाने वालों की भीड़ है। ऐसे में देशी-विदेशी डाॅक्टर्स की साफ चेतावनी है कि रोगी को असहज महसूस करवाना उसकी जान से खेलने जैसा है। यदि आप हाथ फेरकर उसका दर्द महसूस करने की कोशिश में हैं, तो सावधान यह उसकी जान भी ले सकता है।
तकलीफ और तकल्लुफ़ की इस तेज़ धार में हमें सहानुभूति की नहंी, मज़बूत इरादों की नाव खोजनी है। रोग के इलाज़ को आसानी से उपलब्ध तो करवाना ही होगा, साथ ही आत्मविश्वास और खुशमिजाज़ी का भी परिचय देना होगा। असहजता सिर्फ इसी रोग के लिए नहीं, इस जैसी तमाम गंभीर बीमारियों के लिए मुसीबत पैदा कर रही है। तमाम लोग जानलेवा और भयानक कहकर रोगी और उसके परिवार को अंदर से बुरी तरह तोड़कर रख देते हैं। ज़रूरत है इलाज के साथ-साथ प्रेरणा की भी, ऐसी इंस्पिरेशन, जो किसी की जि़ंदगी मंे खुशियां ला सकें, उसे यह भरोसा दिला सके, कि जीने के लिए सभी को खुदा ने संघर्ष सौंपा है।
बस फर्क इतना है कि किसी को बेहद तकलीफ है तो कोई मुस्कराते हुए जी रहा है। दवा और दुआओं के साथ जिस दिन प्रेरित करने वाले भी आगे आएंगे, तो असहनीय दर्द भूलकर हाइड्रोसिफेलस जैसे रोगियों को कुछ ही सही, पर सुकून ज़रूर मिलेगा। आइए हम और आप एक वादा करें, तकलीफ और दर्द से कराहते किसी भी रोगी को ये भरोसा दिलाएं कि ’एक दिन वह बिल्कुल ठीक हो जायेगा, और उस जैसे तमाम लोग ठीक हुए भी हैं। हो सकता है कई लोग झूठी उम्मीद बंधाने को गलत मानते हों, पर क्या कोई झूठ किसी की जान से बढ़कर हो सकता है ?
मयंक दीक्षित
स्वतंत्र पत्रकार, कानपुर।
सोर्स आॅफ इमेज एंड कंटेंटः गूगल ।

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