Wednesday, 10 April 2013


रोटी, कपड़ा और ’मौत’ 


हमें खरीदना है, उन्हें बेचना। मजबूरी और मुनाफे की इस सौदेबाज़ी में नियम-कानून, वैध-अवैध, सही-गलत, जैसी औपचारिकताएं ताक पर रख दीं जातीं हैं, और खड़ी हो जाती है एक ऐसी इमारत, जो खूबसूरत और रिहायशी तो है, पर अफसोस कि सुरक्षित नहीं !


किसी मां का बेटा उस वक्त घर से निकला था, तो किसी मां ने घर में कदम रखे थे, कई हंसते-खेलते परिवार अपनी दुनिया में मशगूल थे। छोटे-बड़े, मासूम-बुजुर्ग अपने आशियानों में जि़ंदगी के वो पल गुज़ार रहे थे, जिन पर उनका ही हक था, सिर्फ उनका! अचानक एक शोर होता है, हाहाकार मचता है और देखते ही देखते सैकड़ों लोग ईंट-पत्थर के बेहद दर्दनाक बोझ तले दब कर अपनी जि़ंदगी सियासी और प्रशासनिक लापरवाही के बदले गंवा बैठते हैं।
महाराष्ट्र के थाणे में पिछले दिनों एक सात-मंजिला इमारत अचानक भरभराकर ढह गई, जिसमें आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 72 लोगों की जान मलबे की भेंट चढ़ गई। कुछ ने अपनों को गंवाया, तो कुछ ने सपनों को, पर गंवाया ज़रूर। कुछ दिनों बाद यह घटना महज़ एक घटना की तरह हमारे दिल-ओ-दिमाग से धुंधली होती जायेगी और हम थर-थर कांपती इस धरती पर गगनचुंबी इमारतें बनाकर अपनी शान-ओ-शौकत देखते और दिखाते रहेंगे।  सवाल यही कि क्या सिर्फ इक्के-दुक्के अफसरान का लालच ही इस घटना का मूल कारण था ..? क्या राज्य के जि़म्मेदारों के बीच बंदरबांट ने ही इन 72 लोगों की जि़ंदगी छीनी है ? यदि आपका दो-टूक जवाब हां है तो कुछ व्यावहारिक बातों पर भी गौर करना होगा।
अकेले बंबई की ही बात करें तो आंकड़ों का साफ इशारा है कि यहां 400 मंे से लगभग 218 इमारतें अवैध निर्माण का झंडा बुलंद किए खड़ी हैं। दरअसल भीतरखाने में झांकें तो दोष हमसे ही शुरु होता है। दूर के शहर-कस्बों से हर रोज़ लाखों की आबादी रोजगार की तलाश में सुनहरे सपनों के साथ मुुंबई और इस जैसे तमाम बड़े शहरों में कदम रखती है। रोटी, कपड़ा के बाद सबसे ज़रूरी मकान ही है, जिसकी किल्लत से इन्हें दो-चार होना पड़ता है। बड़ा शहर, बड़े खर्चे, और तलाश रहती है सस्ते में अच्छे मकान की। यह ’तलाश’ तमाम बिल्डर्स और कंस्ट्रक्शन मालिकों को इस धंधे में सिर उठाने का मौका देती है। वे ज़रूरतमंदों को सस्ती दरों में मकान उपलब्ध कराते हैं, और अवैध निर्माण जैसी कोई खामी होने पर स्थानीय राजनीति की शरण में चले जाते हैं। कुछ नेता, अफसरान और निगम अधिकारियों की ’क्रपा’ से धीरे-धीरे बहुमंजिला  कुकरमुत्ते उगते रहते हैं, और चूक और चालाकी का यह मंज़र कैसे काल बनकर लोगों की खुशियां चीखों में बदल देता है, यह हमारे सामने है।
दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता जैसे तमाम महानगर आज मधुमक्खियों के छत्ते की तरह पटे पड़े हैं। इमारतों के साथ-साथ उनकी बेशुमार कीमतें भी आसमान छू रहीं हैं, और इस प्रतियोगी दौर में अवैध निर्माण जैसे शब्द बेहद आम हो चुके हैं। कुछ साल पहले जब दिल्ली में ललिता पार्क हाउस भरभराकर ढह गया था, तब अवैधता और असुरक्षा मुद्दे पर समाज और सियासत का ध्यान गया था। आनन-फानन दिल्ली म्यूनिसिपल काॅर्पोरेशन ने पूर्वी दिल्ली के 600 भवनों पर अवैध निर्माण का नोटिस चस्पा किया था। अफसोस कि पकड़े जाने पर  छिटपुट कार्रवाई और भीतरी पहुंच, भवन निर्माताओं के मंसूबों पर पानी नहीं फेर पाई। राजधानी में ही शाहदरा साउथ जोन के 683 भवन मालिकों पर नियम-कानून संबंधी इस नोटिस ने भय तो पैदा किया, पर ’रसूख और हनक की राजनीति में सबकुछ जायज़’ वाली कहावत ही जि़ंदाबाद रही।
मुंबई की ही पिछली कुछ घटनाओं पर नज़र डालें तो 13 अगस्त 2008 को भिण्डी बाज़ार इलाके में चार मंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थी, जिसमें 20 की दर्दनाक मौत हुई और 35 लोग घायल बताए गए थे। 3 नवंबर 2008 को पुलिस मुख्यालय के पास बनी एक इमारत का हिस्सा गिरा था, जिनमें 6 की मौत हुई। 26 अगस्त 2009 को लैमिंगटन रोड पर 5 मंजिला इमारत का एक हिस्सा गिरने से एक महिला ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। 28 जुलाई 2010 को कुरला के कुरैशीनगर में चार-मंजिला इमारत फिर ढही, जिसने एक की जान ली। ऐसी कई घटनाएं इस मायानगरी में साल-दर-साल घटतीं आईं हैं, और शोर-शराबे के बीच जि़म्मेदार बचते चले आये, जिसका परिणाम आज हमारे सामने है। दोष का ठीकरा निगम, बिल्डर्स पर फोड़ रहा है, तो बिल्डर्स निगम के ढुल-मुल रवैए को कारण बता रहे हैं। सियासी ज़मात मुआवज़े और सहानुभूति तक सिमटकर रही गई है, पर स्थायी हल खोजने को कहीं भी विचार-विमर्श होता नहीं दिख रहा।
शहर कोई भी हो, उसकी अपनी क्षमता व सीमाएं हैं, जिन्हें लांघने पर हमें ही उसका नुकसान उठाना पड़ेगा। हमने ही अपनी जेब ढीली कर, अंधाधुंध सुविधाएं खरीदने की आदत पाली है। बात यदि सिर्फ बिल्डर्स की गलतियों पर हो रही है, तो हम यह अच्छी तरह समझ लें कि मजबूरी से मातम तक का यह सिरा हमने भी उतनी ही तवज्ज़ो और ताकत से थामा हुआ है। घर नहीं होगा, तो जाएंगे कहां ?  शानदार फ्लैट नहीं होगा तो लोग क्या कहेंगे ? और कुछ रुपए बचाकर इतना आलीशान आशियाना मिल रहा है तो क्यूं छोड़ा जाए ? जैसे सवाल हमारी अपनी जुबान से ही निकले हैं। याद रहे अवैध वस्तु खरीदने और बेंचने वाले बराबर के ही दोषी हैं।
शहर को ज़रूरत से ज्यादा भर देने से वह कराहने लगता है, और बात जब खुद पर आती है, तो हमें दोष के छींटे मजबूरन दूसरों पर उछालने पड़ते हैं। हमें एकजुट होकर ऐसे अवैध निर्माणों के लिए सचेत होना होगा, और जल्दबाजी और कम पैसों के लालच में इन गगनचुंबी भवनों में स्टेटस सिंबल देखना बंद करना होगा। सरकार सिर्फ हमसे कर वसूलने के लिए ही नहीं है, उसकी जि़म्मेदारी यह भी है कि उसके नागरिक स्वस्थ्य, सुरक्षित और खुशहाल रहें। गलतियों से सीख लेते हुए हमें सतर्क रहकर  आशियाने खरीदने होंगे, जिसमें वैधता हमारी प्राथमिकता में हो। कम पैसों के चक्कर में हम भले ही कुछ हज़ार या लाख बचा लें, पर जान, कीमत से कहीं बढ़कर है। सिर्फ अफसरान या व्यवस्था को कोसकर हम असल मुद्दे को सुलझाने की बजाय उसमें उल्टा उलझते ही जाएंगे।
-मयंक दीक्षित
                                                        स्वतंत्र पत्रकार, कानपुर।

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